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पृथ्वीराज चौहान का इतिहास जीवन परिचय युद्ध और मृत्यु – History of Prithviraj Chauhan in Hindi

आज के इस पोस्ट मे पृथ्वीराज चौहान की जीवनी इतिहास History of Prithviraj Chauhan in Hindi के बारे मे जानेगे। इतिहास में कुछ लोग हमेशा याद किए जाते हैं, जब भी बात भारतीय इतिहास में वीर योद्धाओ और शासको का नाम आता है, उनमे पृथ्वीराज चौहान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिनमे तो सबसे पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता के प्यार के किस्से हो या मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के युद्ध के किस्से जरूर आते है, तो चलिये यहा पृथ्वीराज चौहान का इतिहास जीवन परिचय युद्ध भारत पर आक्रमण और मृत्यु History of Prithviraj Chauhan in Hindi Biography Jeevan Parichay Date Of Birth, Birth Place, Father, Mother, Wife Children, Fight, Death जानेगे.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास जीवन परिचय युद्ध और मृत्यु

History of Prithviraj Chauhan in Hindi

History of Prithviraj Chauhan in Hindiआज के इस पोस्ट मे हम अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के इतिहास के बारे में जानेगे. चौहान दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू शासक थे, गौरी के साथ दूसरे युद्ध में पराजय के पश्चात यह हिन्दवी सूरज डूब गया था,

भारत की पवित्र धरती पर सदियों से कई वीरों ने जन्म लिया और उन्होंने भारत माता की आन, मान और शान के लिए खुद के जीवन की आहुति दे दी। ऐसे ही वीर राजा पृथ्वीराज चौहान हुए, जो चौहान वंश में जन्मे आखरी हिंदू शासक थे। जिन्होंने मात्र 11 वर्ष की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद दिल्ली और अजमेर का शासन संभाला और उसका विस्तार भी किया।

तो इस पोस्ट मे हम एक ऐसे वास्तविक कहानी एक ऐसे वीर योद्धा की जिसने अपने जीवनकाल में बहुत से युद्ध लड़े और और अपनी बहादुरी से दुश्मन को परास्त किया अपितु कई बार उसे क्षमादान दिया, कहानी एक ऐसे ही भारत के वीर की, पृथ्वीराज चौहान जिसका उपनाम राय पिथोरा था, राय पिथोरा आज के दिल्ली में राय पिथोरा के किले के रूप में जिर्णो अवस्था में उपस्थित है उनका जन्म चाहमाना वंश के राजा सोमेश्वर और रानी कर्पूरदेवी के यहाँ गुजरात में हुआ,

राजा सोमेश्वर को उनके रिश्तेदार उन्हें चाहमाना दरबार में ले आये, वह पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर को पृथ्वीराज द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उनको राजा बनाया गया जब पृथ्वीराज 11 वर्ष के थे तब उनके पिता विक्रम सम्वत के अनुसार 1234 में स्वर्गवासी हो गए, तब पृथ्वीराज को उनकी माता के संरक्षण में ताजपोशी की गयी | चाहमाना दरबार उस समय के अजयमेरु राजस्थान में है, जो की आज के अजमेर शहर के नाम से जानते है, पृथ्वीराज ने अपने शुरुआती दौर में ही अपने पडोसी राज्यों से युद्ध लड़े, वे बचपन से ही युद्धनीति और राजनीती में कुशल थे | उन्होंने अपने विरोधियो से युद्ध लड़ने के बाद अन्य राज्यों पर आक्रमण किया और अपने राज्य की सीमा विस्तार किया |

पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास मे एक बहुत ही अविस्मरणीय नाम है. चौहान वंश मे जन्मे पृथ्वीराज आखिरी हिन्दू शासक भी थे. महज 11 वर्ष की उम्र मे, उन्होने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात दिल्ली और अजमेर का शासन संभाला और उसे कई सीमाओ तक फैलाया भी था, परंतु अंत मे वे राजनीति का शिकार हुये और अपनी रियासत हार बैठे, परंतु उनकी हार के बाद कोई हिन्दू शासक उनकी कमी पूरी नहीं कर पाया. पृथ्वीराज को राय पिथोरा भी कहा जाता था. पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही एक कुशल योध्दा थे, उन्होने युध्द के अनेक गुण सीखे थे. उन्होने अपने बाल्य काल से ही शब्दभेदी बाण विद्या का अभ्यास किया था. तो चलिये इस पोस्ट के जरिये सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास, कहानी, कथा, जीवन परिचय, वंशज, संयोगिता, प्रेम कहानी, जयंती, जन्म, मृत्यु कैसे हुई, बेटे, बेटी, मित्र, धर्म, जाति विवाद (Prithviraj Chauhan Biography Hindi) (Wife, Sanyogita, Kahani, Birth, Death, Reason, Movie Release Date, Caste, Religion) को जानते है,

पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय

Prithviraj Chauhan Biography in Hindi

पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय :
वास्तविक नाम :-    पृथ्वीराज चौहान
उपनाम :- भारतेश्वर, पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दूसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा
व्यवसाय :- क्षत्रिय
जन्मतिथि :-  1 जून 1163 (आंग्ल पंचांग के अनुसार)
जन्मस्थान :- पाटण, गुजरात, भारत
मृत्यु तिथि :- 11 मार्च 1192 (आंग्ल पंचांग के अनुसार)
मृत्यु स्थल :- अजयमेरु (अजमेर), राजस्थान
आयु (मृत्यु के समय) :- 28 वर्ष
राष्ट्रीयता :- भारतीय
गृहनगर :- सोरों शूकरक्षेत्र, उत्तर प्रदेश (वर्तमान में कासगंज, एटा) कुछ विद्वानों के अनुसार जिला राजापुर, बाँदा (वर्तमान में चित्रकूट)
धर्म :- हिन्दू
वंश  :- चौहानवंश
पिता :- सोमेश्वर
माता :- कर्पूरदेवी
भाई :- हरिराज (छोटा)
बहन :- पृथा (छोटी)
वैवाहिक स्थिति      विवाहित
पत्नी :- कुल 13 पत्निया (जम्भावती पडिहारी, पंवारी इच्छनी, दाहिया, जालन्धरी, गूजरी, बडगूजरी, यादवी पद्मावती, यादवी शशिव्रता, कछवाही, पुडीरनी, शशिव्रता, इन्द्रावती, संयोगिता गाहडवाल)
बच्चे बेटा :- गोविन्द चौहान
बेटी :- कोई नहीं

पृथ्वीराज चौहान का जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

Birth and Early life of Prithviraj Chauhan in Hindi

महान शूरवीर और पराक्रमी योद्धा पृथ्वीराज चौहान का जन्म सन 1149 में पाटण (गुजरात) में हुआ था। इनके पिता का नाम महाराजा सोमेश्वर था और माता का नाम कर्पुरा देवी था।  माता पिता दोनों ने अपने बेटे को बचपन से ही साहसी और निडर पाया और इसलिए उन्होंने पृथ्वीराज की तुलना अपने नाना से की क्योंकि वह भी एक बहादुर शासक था। इनके पिता अजमेर के राजा थे। 11 वर्ष के उम्र में ही इनके पिता की मृत्यु हो गई तब इन्होंने छोटी उम्र में ही अजमेर का कार्यभार संभाला और अजमेर के उत्तराधिकारी बने।

इनका जन्म इनके माता-पिता की विवाह के 12 वर्ष के बाद हुआ था, जिसके कारण राज्य में कई लोगों को इनके उत्तराधिकारी बनने पर नापाबंदी थी, जिसके कारण वे हमेशा से इनके विरुद्ध षड्यंत्र रहते थे। लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने एक कुशल शासक बनके जनता की उम्मीदों पर खरा उतरे।

पृथ्वीराज चौहान की शिक्षा

Prithviraj Chauhan Education in Hindi

पृथ्वीराज चौहान और उनके छोटे भाई दोनों का पालन-पोषण गुजरात में हुआ, जहाँ उनके पिता सोमेश्वर का पालन-पोषण उनके नाना-नानी ने किया। पृथ्वीराज अच्छी तरह से शिक्षित थे।

मात्र पांच साल की उम्र में, पृथ्वीराज ने अजयमेरु (वर्तमान में अजमेर) में विग्रहराज द्वारा स्थापित “सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ” से (वर्तमान में वो विद्यापीठ ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ नामक एक ‘मस्जिद’ है) से अपनी शुरुआती शिक्षा प्राप्त की थी पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध की भी शिक्षा ग्रहण की और आगे चलकर एक कुशल योद्धा बने। इन्हें राय पिथौरा भी कहा जाता था। बचपन से ही कुशल योद्धा थे। अपने बाल्य काल से ही शब्दभेदी बाण विद्या का अभ्यास किया था, जिसके जरिए वे बिना देखे आवाज के आधार पर बाण चला सकते थे।

पृथ्वीराज चौहान ने संस्कृत, प्राकृत, पैशाची, शौरसेनी, मागधी और अपभ्रंश भाषा समेत छह भाषाओं का भी ज्ञान लिया था। इसके अतिरिक्त इन्होंने मीमांसा, वेदान्त, पुराण, इतिहास, सैन्य विज्ञान, गणित और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान लिया था। ये अश्व और हाथी नियंत्रण विद्या में भी माहीर थे।

पृथ्वीराज चौहान का दिल्ली पर उत्तराधिकार

Succession of Prithviraj Chauhan to Delhi in Hindi

पृथ्वीराज चौहान की माता कपूरी देवी अपने पिता की एकमात्र संतान थी, जिसके कारण कपूरी देवी के पिता महाराजा अंगनपाल, जो दिल्ली के राजा थे। उन्हें इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनके साम्राज्य का कार्यभार कौन संभालेगा?

इस प्रकार विचार करते हुए उन्हें अपनी मृत्यु के बाद पृथ्वीराज चौहान को उत्तराधिकारी बनाने का सुझाव आया। तब वे पृथ्वीराज चौहान के पिता-माता दोनों की सहमति से पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली के उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया और फिर सन 1166 में महाराज अंगनपाल की मौत होने के बाद दिल्ली की गद्दी पर नए राजा के तौर पर पृथ्वीराज चौहान का राज्य अभिषेक कराया गया।

पृथ्वीराज चौहान का प्रथम युद्ध

Prithviraj Chauhan First War in Hindi

राजा के रूप में पृथ्वीराज का पहला युद्ध अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह को दबाने के रूप में हुआ। इस जीत ने पृथ्वीराज को मजबूत किया। लेकिन भारत में पृथ्वीराज चौहान की ख्याति 1182 ईसवीं में लड़े गए युद्ध से हुई। जिसमें उन्होंने शक्तिशाली चंदेल राजा परमार देव चंदेल को हरा दिया। और उस वक्त पृथ्वीराज की उम्र केवल 16 साल थी। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को अपार धन-दौलत भी मिला। पृथ्वीराज जब अपने शासन के शिखर पर थे तो उनका राज्य मौजूदा समय में राजस्थान (अधिकांश क्षेत्र), पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी मध्य प्रदेश और दक्षिणी पंजाब तक फैला हुआ था।

पृथ्वीराज चौहान का विवाह

Prithviraj Chauhan marriage in Hindi

राजा पृथ्वीराज चौहान की कुल तेरह रनिया थी जिनमे से कुछ प्रमुख रानियाँ जिनमे जम्भावती, इच्छनी, यादवी शशिव्रता, हंसावती और संयोगिता है | उनका प्रथम विवाह जब वे 11 वर्ष के थे तब हुआ उसके पश्चात कई और रानियों से विवाह हुआ जब वे 36 वर्ष के हुए तब उनकी कीर्ति और वीरता से प्रभावित होकर राजकुमारी संयोगिता उनसे प्रेम करने लगी और इन बातो से उनके पिता कन्नौज के राजा जयचंद ने उनका स्यंवर रचाया जिससे राजा पृथ्वीराज को जब ये बात ज्ञात हुयी तो उन्होंने राजकुमारी संयोगिता को भरे दरबार में से अपहरण कर लिया और उनसे गन्धर्व विवाह करने के पश्चात उन्हें रानी बनाया और इस तरह भारत के इतिहास में एक प्रेम कहानी सुनहरे पन्नो में दर्ज हुयी,

पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता की प्रेम कहानी

Love story of Prithviraj Chauhan and princess Sanyogita in Hindi

पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता की प्रेम कहानी बहुत ही रोचक है। संयोगिता राजा जयचंद की पुत्री थी, जो कन्नौज के राजा थे। संयोगिता बचपन से ही काफी सुंदर थी और वह अपनी सहेलियों से पृथ्वीराज चौहान के वीरता के कई सारे किस्से सुनी हुई थी, जिसके कारण वह पृथ्वीराज चौहान को एक बार देखना चाहती थी।

उसी बीच एक बार दिल्ली से पन्नाराय नाम के चित्रकार दिल्ली के सौंदर्य और राजा पृथ्वीराज के चित्र को लेकर कन्नौज आए हुए थे। जब रानी संयोगिता को इसके बारे में पता चला तो वह उस चित्रकार को अपने पास बुलवाया। संयोगिता ने चित्रकार पन्नाराय को पृथ्वीराज चौहान की तस्वीर दिखाने के लिए आग्रह किया।

तस्वीर देखते ही संयोगिता पृथ्वीराज चौहान पर मोहित हो जाती है, जिसके बाद वह चित्रकार पन्ना राय को अपनी तस्वीर बनाकर अपनी मन की बात पृथ्वीराज चौहान को कहने के लिए कहती है।

चित्रकार पन्नाराय रानी संयोगिता का चित्र बनाकर पृथ्वीराज चौहान के सामने प्रस्तुत करते हैं और उनके मन की बात भी बताते हैं। तस्वीर में संयोगिता की सुंदरता को देख पृथ्वीराज चौहान भी उन पर मोहित हो जाते हैं। धीरे-धीरे एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखते हैं और दोनों का प्रेम और भी ज्यादा बढ़ते जाता है।

अब संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम की कहानी धीरे-धीरे राज्यों के अन्य लोगों के कानों में भी आने लगी। जब इस बात का पता संयोगिता के पिता जयचंद को पता चलता है तो वह संयोगिता का स्वयंवर आयोजित करते हैं। क्योंकि जयचंद पृथ्वीराज चौहान से दुश्मनी थी, जिसके कारण वे नहीं चाहते थे कि दोनों आपस में शादी करें।

जयचंद ने अपनी पुत्री के लिए स्वयंवर आयोजित किया, जहां पर अनेक देश के राजकुमारों को बुलाया गया था। वहां पर पृथ्वीराज चौहान का अपमान करने के लिए जयचंद ने किले के बाहर दरवाजे पर द्वारपाल के जगह पर पृथ्वीराज चौहान के पुतले को लगाने का आदेश दिया।

संयोगिता पहले से ही पृथ्वीराज चौहान को पत्र में खुद को अगवा करने का संदेश भेजती है। उसके बाद जब संयोगिता वरमाला पहनाने के लिए आती है तो वह पृथ्वीराज चौहान के पुतले पर माला डाल देती है, जिसे देख उनके पिता अपमानित और क्रोधित होते हैं।

इसी बीच पृथ्वीराज चौहान संयोगिता के पत्र को पढ़ने के बाद स्वयंवर में पहुंच जाते हैं और संयोगिता की सहमति पर संयोगिता को अगवा करके अपनी राजधानी ले जाते हैं, वहां पर पहुंचने के बाद दोनों शादी कर लेते हैं। आगे चलकर संयोगिता एक पुत्र को जन्म देती है जिनका नाम गोविन्द चौहान रखा गया था.

इस विवाह के पश्चात राजा पृथ्वीराज और राजा जयचंद के राजनैतिक सम्बन्ध बिगड़ गए और इसका असर भारत के इतिहास को एक बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी पृथ्वीराज ने कई युद्ध लड़े जिनमे से एक तराइन का युद्ध महत्वपूर्ण युद्ध रहा 1182 में पृथ्वीराज का युद्ध पहली बार सतलज के मैदान में मुहम्मद गौरी से हुआ जिसका परिणाम मुहम्मद गौरी को हार का सामना करना पड़ा उसके पश्चात सूर नामक सामंत प्रत्येक वर्ष कर लेने जाता था,

पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सैनिक अभियान एवं विजय

Major Military Campaigns and Victories of Prithviraj Chauhan in Hindi

तो चलिये पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सैनिक अभियान एवं विजय को जानते है, जो की इस प्रकार है –

नागार्जुन एवं भंडानको का दमन

Suppression of Nagarjuna and Bhandanko in Hindi

पृथ्वीराज के राजकाज सम्भालने के कुछ समय बाद उसके चचेरे भाई नागार्जुन ने विद्रोह कर दिया. अतः पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम अपने मंत्री कैमास की सहायता से सैन्य बल के साथ उसे पराजित कर गुडापुरा एवं आसपास का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिए. इसके बाद ११८२ ई में पृथ्वीराज ने भरतपुर मथुरा क्षेत्र में भंडानको के विद्रोह का अंत किया.

महोबा के चंदेलो पर विजय

Victory over the Chandelos of Mahoba in Hindi

1182-83 सीई के वर्षों के बीच, पृथ्वीराज के शासनकाल के मदनपुर शिलालेखों ने दावा किया कि उन्होंने जेजाकभुक्ति को हराया था जिस पर चंदेल राजा परमार्दी का शासन था।

पृथ्वीराज ने 1182 ई में ही महोबा के परमाल देव को हराकर उसे संधि के लिए विवश किया.

चालुक्यो पर विजय

Victory over the Chalukyas in Hindi

सन 1184 के लगभग गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार एवं पृथ्वीराज की सेना के मध्य नागौर का युद्ध हुआ जिसके बाद दोनों में संधि हो गई एवं चौहानों की चालुक्यों से लबी शत्रुता का अंत हो गया.

युद्ध को समाप्त करने के लिए एक शांति संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे जो अतीत में दोनों राज्यों के बीच एक दूसरे के साथ थी।

कन्नौज से संबंध

Connection with Kannauj in Hindi

पृथ्वीराज के समय कन्नौज पर गहडवाल शासक जयचंद का शासन था. जयचंद एवं पृथ्वीराज दोनों की राज्य विस्तार की महत्वकांक्षाओ ने उनमें आपसी वैमनस्य उत्पन्न कर दिया.

उसके बाद उसकी पुत्री संयोगिता को पृथ्वी राज द्वारा स्वयंवर से उठा कर ले जाने के बाद दोनों में शत्रुता और बढ़ गई थी. इसी वजह से तराईन के युद्ध में जयचंद ने पृथ्वीराज की सहायता न कर मुहम्मद गौरी की सहायता की.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान का नागार्जुन से संघर्ष

Emperor Prithviraj Chauhan struggle with Nagarjuna in Hindi

पृथ्वीराज चौहान ने वर्ष 1180 ईस्वी में पूर्ण नियंत्रण ले लिया और जल्द ही उन्हें कई हिंदू शासकों ने चुनौती दी जिन्होंने चाहमान वंश पर कब्जा करने की कोशिश की।

पृथ्वीराज चौहान की पहली सैन्य उपलब्धि उनके चचेरे भाई नागार्जुन पर थी। नागार्जुन पृथ्वीराज के चाचा विग्रहराज चतुर्थ के पुत्र थे जिन्होंने सिंहासन पर उनके राज्याभिषेक के खिलाफ विद्रोह किया था।

पृथ्वीराज ने गुडापुरा पर पुनः कब्जा करके अपना सैन्य वर्चस्व दिखाया, जिस पर नागार्जुन ने कब्जा कर लिया था। यह पृथ्वीराज की प्रारंभिक सैन्य उपलब्धियों में से एक थी।

पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का युद्ध

Battle of Prithviraj Chauhan and Mohammad Ghori in Hindi

पृथ्वीराज की सेना मे 3 लाख सैनिक और 300 हाथियों का काफिला था, जो को काफी विशाल थी, जिसके कारण उन्होंने काफी दूर तक अपने राज्य का विस्तार फैलाया था। पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच में कुल 18 बार युद्ध हुआ था, जिसमें 17 बार तो उन्होंने मोहम्मद गोरी को हराया था। अठारहवीं बार मोहम्मद गोरी से पराजित हो जाते हैं लेकिन अंत में मोहम्मद गोरी को मार डालते हैं।

पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का जो प्रथम युद्ध हुआ था, वह सरहिंद किले के पास तराई नामक स्थान पर हुआ था। पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच प्रथम युद्ध पंजाब तक अपने शासन को फैलाने के दौरान हुआ था। पृथ्वीराज चौहान ने पंजाब में भी अपने राज्य का विस्तार फैलाने का निर्णय लिया। लेकिन उस समय संपूर्ण पंजाब पर मोहम्मद गौरी का शासन था, जिसके कारण पृथ्वीराज चौहान के लिए बिना मोहम्मद गोरी से लड़े पंजाब पर शासन करना नामुमकिन था।

इसीलिए पृथ्वीराज चौहान ने अपनी विशाल सेना के साथ मोहम्मद गोरी पर आक्रमण किया। दोनों के बीच युद्ध हुए अंत में मोहम्मद गोरी हार जाता है और पृथ्वीराज चौहान पंजाब पर शासन करने लगते हैं। उसके बाद भी मोहम्मद गोरी ने कई बार पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया लेकिन हर बार वह हार जाता है।

लेकिन फिर अंत में जब मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज चौहान और जयचंद की दुश्मनी के बारे में पता चलता है तब वह जयचंद की सहायता से दोबारा पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमन करता है। यह युद्ध भी तराइन के मैदान में ही होता है।

उस समय संयोगिता के स्वयंवर में हुए घटना के कारण कई सारे राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से निराश थे, जिसके कारण उस समय किसी भी राजपूत राजाओं ने पृथ्वीराज चौहान का साथ नहीं दिया, जिसके कारण वे अकेले पड़ गए।

ऐसे में पृथ्वीराज चौहान ने अकेले ही अपने 300000 सैनिकों के साथ मोहम्मद गौरी का सामना किया। लेकिन मोहम्मद गोरी की सेना में अच्छे घुड़सवार थे, जिन्होंने मोहम्मद गौरी के सेना को चारों तरफ से घेर लिया। इसके कारण पृथ्वीराज चौहान की हार हो जाती है।

जिसके बाद गौरी पृथ्वीराज चौहान और चंद्र बरदाई को बंदी बना लिया जाता है। जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान के साथ गद्दारी की और उसे भी गद्दारी का फल भुगतना पड़ा। मोहम्मद गौरी ने जयचंद की भी हत्या कर दी। इस तरीके से पृथ्वीराज चौहान को हराकर मोहम्मद गोरी फिर से पूरे पंजाब, दिल्ली, अजमेर और कन्नौज पर शासन पा लेता है।

इसके बाद कोई भी राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की तरह दोबारा दिल्ली पर शासन पाने के लिए अपनी अपनी वीरता साबित नहीं कर पाया।

तराइन का प्रथम युद्ध 1191 का इतिहास

History of the First Battle of Tarain in Hindi

पृथ्वीराज के दिल्ली हांसी सरस्वती एवं सरहिंद के दुर्गों को जीतकर अपने अधिकार में कर लेने के बाद 1191-91 में गौरी ने सरहिंद पर अधिकार कर अपनी सेना वहां रख दी. पृथ्वीराज अपने क्षेत्र से आक्रान्ताओं को भगाने हेतु सरहिंद पर आक्रमण करने हेतु बढ़ा.

मुहम्मद गौरी अपने विजित क्षेत्र को बचाने हेतु विशाल सेना सहित तराइन के मैदान में आ डटा. पृथ्वीराज भी अपनी सेना सहित वहां पंहुचा. दोनों सेनाओं के मध्य तराइन का प्रथम युद्ध हुआ जिसमें दिल्ली के गर्वनर गोविन्दराज ने मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया.

घायल गौरी युद्ध भूमि से बाहर निकल गया एवं कुछ ही समय में गौरी की सेना मैदान छोड़ भाग खड़ी हुई. पृथ्वीराज इस विजय के बाद भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा न कर मुहम्मद गौरी व उसकी सेना को जाने दिया. पृथ्वीराज ने ऐसा कर बड़ी भूल की जिसकी कीमत उसे अगले वर्ष ही तराइन के द्वितीय युद्ध में चुकानी पड़ी.

तराइन के द्वितीय युद्ध का इतिहास (1192)

History of the Second Battle of Tarain in Hindi

प्रथम युद्ध में जीत के बाद पृथ्वीराज निश्चिन्त हो आमोद प्रमोद में व्यस्त हो गया, जबकि गौरी पुरे मनोयोग से विशाल सेना को पुनः एकत्रित की एवं युद्ध की तैयारियों में व्यस्त रहा.

एक वर्ष बाद 1192 ई में ही गौरी अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वी राज से अपनी हार का बदला लेने हेतु तराइन के मैदान में पुनः आ धमका. पृथ्वीराज को समाचार मिलते ही वह भी सेना सहित युद्ध मैदान की ओर बढ़ा. उसके साथ उसके बहनोई शासक समरसिंह एवं दिल्ली के गर्वनर गोविन्द राज भी थे.

दोनों सेनाओं के मध्य तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ जिसमें साम दाम दंड भेद की नीति से मुहम्मद गौरी की विजय हुई. अजमेर व दिल्ली पर उसका अधिकार हो गया. तराइन के युद्ध के बाद गौरी ने अजमेर का शासन का भार कर के बदले पृथ्वी राज के पुत्र गोविन्द राज को दे दिया.

परन्तु कुछ समय बाद ही पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने उसे पदच्युत कर अजमेर पर अपना अधिकार कर लिया. तब गोविन्दराज ने रणथमभौर में चौहान वंश के शासन की शुरुआत की,

मुहम्मद गौरी ने भारत में विजित अपने क्षेत्रों का प्रशासन अपने दास सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को सम्भला दिया एवं स्वयं लौट गया. ऐबक ने अजमेर में विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला तुड़वाकर ढाई दिन के झोपड़े में परिवर्तित कर दिया.

तराइन का तृतीय युद्ध

History of the Third War of Tarain in Hindi

भारतीय इतिहास की एक निर्णायक एवं युग परिवर्तनकारी घटना साबित हुआ. इससे भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य का प्रारम्भ हुआ. मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक बना.

इसके बाद धीरे धीरे गौरी ने कन्नौज, गुजरात, बिहार आदि क्षेत्रों को जीता और कुछ ही वर्षों में उत्तरी भारत पर मुस्लिम आक्रमणकारियों का शासन स्थापित हो गया, तराइन के दोनों युद्धों का विस्तृत कवि चन्द्र बरदाई के पृथ्वीराज रासो हसन निजामी के नाजुल मासिर एवं सिराज के तबकात ए नासिरी में मिलता हैं. तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय का प्रमुख कारण गौरी की कुशल युद्ध निति थी.

इसके अलावा पृथ्वीराज का अपने चारो ओर के राजाओं को अपना शत्रु बना लेना, उसमें दूरदर्शिता का अभाव युद्ध की तैयारी न कर आमोद प्रमोद में व्यस्त रहना एवं दुश्मन को कम कर आंकना आदि अन्य कारण थे

जिनकी वजह से पृथ्वीराज तृतीय का तुर्क प्रतिरोध असफल हो गया और देश अन्तः सैकड़ों वर्षों की गुलामी में जकड़ता रहा, पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबार में पृथ्वीराज विजय का लेखक जयानक पृथ्वीराज रासो के लेखक एवं उसके मित्र चन्द्र बरदाई जर्नादन वागीश्वर आदि विद्वानों को आश्रय प्राप्त था.

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु

Death of Prithviraj Chauhan in Hindi

पृथ्वीराज को पराजित करने के बाद गौरी पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई को बंदी बनाकर अपने राज्य ले आता है, जहां पर वह पृथ्वीराज चौहान को बहुत यातनाएं देता है। यहां तक कि गर्म लोहे के सरिए से पृथ्वीराज चौहान की आंखों को भी जला देता है, जिससे पृथ्वीराज चौहान अपनी आंखों की रोशनी खो देते हैं।

उसके बाद मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु से पहले उनकी आखिरी इच्छा पूछते हैं तब चंदबरदाई की सलाह पर पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण चलाने के करतब प्रदर्शन करने की इच्छा प्रकट करते हैं।

तब चंदबरदाई एक श्र्लोक कहा :-

चार बांस चौबीस गज, अङ्गुल अष्ट प्रमान।

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।”

जिसके जरिए पृथ्वीराज चौहान को एक संकेत देते हैं कि मोहम्मद गोरी कितनी ऊंचाई पर बैठे हैं ताकि पृथ्वीराज चौहान उतनी ऊंचाई पर ही निशाना लगाए।

उसी संकेत पर पृथ्वीराज चौहान बाण छोड़ते हैं और एक ही बाण में गौरी के मस्तिष्क को भेद देता है। उसके बाद अंत में अपनी दुर्दशा से बचने के लिए पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई एक दूसरे की हत्या करके मर जाते हैं।

पृथ्वीराज चौहान की मौत चाहे जैसे हुई हो, लेकिन तराईन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार ने भारत का इतिहास ही बदल दिया। क्योंकि उसी के बाद भारत में मुस्लिम शासन का दौर शुरू हुआ। सबसे पहले 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा गुलाम वंश की स्थापना हुई। उसके बाद खिलजी वंश, तुगलक वंश और मुगल वंश के शासकों शासन रहा है। और उसके बाद भारत अंग्रेजों का गुलाम हो गया। जिनसे फिर 15 अगस्त 1947 में भारत को आजादी मिली।

पृथ्वीराज चौहान से जुड़े रोचक तथ्य

Interesting facts about Prithviraj Chauhan in Hindi

तो चलिये पृथ्वीराज चौहान से जुड़े रोचक तथ्यो को जानते है, जो की इस प्रकार से है :-

पृथ्वीराज चौहान से जुड़े रोचक तथ्य
पृथ्वीराज चौहान के बचपन के मित्र चंदबरदाई थे, जिन्हें वे अपने भाई की तरह मानते थे।
पृथ्वीराज चौहान एक वीर और बहादुर राजा के साथ ही इनमें एक योग्य राजा का गुण था, जो अपने प्रजा का भला करती है। यही कारण था कि मात्र 13 साल की उम्र में ही पृथ्वीराज चौहान अजमेर के राजगढ़ के राज्य गद्दी को संभाले थे।
चंदबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान की जीवन पर आधारित पृथ्वीराज रासो ग्रंथ की रचना भी की। यह ग्रंथ काव्य ग्रंथ है, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के संपूर्ण जीवन को काव्य के माध्यम से बताया गया है।
पृथ्वीराज चौहान इतने बहादुर थे कि माना जाता है बचपन में इन्होंने बिना किसी हथियार के ही एक शेर के जबड़े को चीर दिया था।
पृथ्वीराज चौहान को शब्दभेदी बाण चलाना आता था, जिसके कारण वे मोहम्मद गोरी की हत्या कर पाए थे।
पृथ्वीराज चौहान की समाधी अफगानिस्तान के गजनी शहर के बाहर बनाया गया।
पृथ्वीराज चौहान ना केवल भारत के 1 वीर राजा हुए बल्कि एक ज्ञानी भी थे। इन्हें 6 भाषाओं का ज्ञान था, जिनमें मगदी, प्राकृत, संस्कृत, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश आदि है।
यही नहीं इन्हें गीता, पुराण, गणित, वेदांत, मीमांसा सैन्य विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र जैसे अन्य क्षेत्र का भी ज्ञान था।
पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को 17 बार युद्ध में हराया था और हर बार वे उसे माफी देकर छोड़ देते थे। लेकिन 18वीं बार मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान को धोखे से पराजित कर देता हैं।
पृथ्वीराज चौहान हिंदू सम्राट, भारतेश्वर, पृथ्वीराज तृतीय आदि के नाम से भी लोकप्रिय थे।
पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता था।
पृथ्वीराज चौहान की सेना बहुत ही विशाल थी। माना जाता है उनकी सेना में 300 हाथी और 300000 से भी ज्यादा सैनिक थे। यही कारण था कि इतनी विशाल सेनाओं के बलबूते इन्होंने प्रथम तराइन के युद्ध में मोहम्मद गौरी को हराया था।
पृथ्वीराज चौहान वंश में जन्मे आखिरी हिंदू शासक थे।

पृथ्वीराज चौहान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर FAQ

Some important questions and answers related to Prithviraj Chauhan in Hindi

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान कहाँ के राजा थे?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान एक क्षत्रीय राजा थे, जो 11 वीं शताब्दी में 1178-92 तक एक बड़े साम्राज्य के राजा थे. ये उत्तरी अमजेर एवं दिल्ली में राज करते थे.

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान का जन्म सन 1166 में गुजरात में हुआ था.

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान के राज दरबारी कवि कौन थे?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंदबरदाई थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान की आत्मकथा पृथ्वीराज रासो ग्रंथ लिखा।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच कितने बार युद्ध हुआ था?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच 18 बार युद्ध हुआ था।

प्रश्न :- संयोगिता किसकी पुत्री थी?

उत्तर :- संयोगिता कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री थी।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान की कितनी पत्नियां थी?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान की तेरह रानियां थी, जिनमें से संयोगिता सबसे सुंदर थी।

प्रश्न :- सम्राट पृथ्वीराज की इतिहास प्रसिद्ध रानी का नाम क्या था?

उत्तर :- संयोगिता, ये चौहान की प्रिय रानी थी इनकी प्रेम कहानी काफी लोकप्रिय हैं.

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान के पुत्र कितने थे?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान का एक पुत्र था जिसका नाम गोविंद चौहान था।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान के परम मित्र का नाम क्या था?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान के परम मित्र और राजकवि चंद्रवरदाई थे। जिन्होंने पृथ्वीराज रासो नामक एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखा था जिसमें पृथ्वीराज और संयोगिता के प्रेम और उन के युद्धों का चित्रण किया था

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु का मुख्य कारण मुहम्मद गौरी के द्वारा दी गई यातनाये है जिसके बारे में कई इतिहासकारो ने कई तरह के तर्क दिए है जैसे उन्हें गद्दे में डालकर पत्थरो से मार देना , उनकी आँखों में गर्म सलिये डाल कर फोड़ देना, उनका गला काट देना लेकिन अभी तक सही बात क्या थी इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान की कब्र कहाँ है?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान की कब्र पहले अफगानिस्तान में थी लेकिन शेर सिंह राणा उनकी कब्र अफगानिस्तानियो के नाक के नीचे से निकालकर भारत ले आये थे।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को कितनी बार हराया?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान ने 17 बार मोहमद गौरी को युद्ध मे हराया था और जिसके बाद में उन्होंने मोहमद गौरी को और उसकी शक्ति को कम आंक लिया था और जिसका परिणाम यह हुआ 18वी लड़ाई में मोहमद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया था।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद संयोगिता का क्या हुआ?

उत्तर :- पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद संयोगिता ने अन्य हिंदू रानियों के साथ जोहर करने का निर्णय लिया। लेकिन मोहम्मद गोरी का सेनापति कुतुबुद्दीन संयोगिता और उन सभी हिंदू रानियों को हरण करना चाहता था, जिसके लिए उसने किले के बाहर डेरा डाल दिया था। लेकिन जब तक किले का दरवाजा खोल पाता तब तक संयोगिता और सभी रानियां जोहर कर चुकी थी।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान के मित्र कौन थे?

उत्तर :- चंदबरदाई।

प्रश्न :- पृथ्वीराज चौहान का भारतीय इतिहास में क्या योगदान रहा?

उत्तर :- ये महान हिन्दू राजपूत राजा था, जो मुगलों के खिलाफ हमेशा एक ताकतवर राजा बन कर खड़े रहे. इनका राज उत्तर से लेकर भारत में कई जगह फैला हुआ था.

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