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हुमायूं का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु | History of Humayun in Hindi

आज के इस पोस्ट मे हुमायूं का इतिहास History of Humayun in Hindi के बारे मे जानेगे। वैसे तो हिंदुस्तान में सालो तक राज करने वाले मुगलो के इतिहास की कई घटनाये प्रमुख है तो चलिये यहा हुमायूं का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु | History of Humayun in Hindi Humayun Biography Jeevan Parichay Date Of Birth, Birth Place, Father, Mother, Wife Children, Fight, Mughal Empire जानेगे.

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हुमायूं का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु की पूरी जानकारी

History of Humayun in Hindi

History of Humayun in Hindiहुमायूं एक प्रख्यात मुगल सम्राट था, जो बाबर का सबसे बड़ा पुत्र था। हुंमायूं एक इकलौता ऐसा मुगल शासक था, जिसने अपने पिता बाबर की आज्ञा का पालन करते हुए अपने मुगल सम्राज्य का बंटबारा अपने चारों भाईयों में किया था। हुंमायूं ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ावों को देखा था। हुंमायूं को सबसे ज्यादा कष्ट उसके भाईयों से मिला था। वहीं अफगान शत्रुओं ने हुंमायूं की मुसीबतों को और भी ज्यादा बढ़ा दिया था, तो आइए जानते हैं, मुगल सम्राट हुंमायूं के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य, हुमायूं का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु History of Humayun in Hindi Biography Jeevan Parichay Date Of Birth, Birth Place, Father, Mother, Wife Children, Fight, Mughal Empire के बारे मे।

हुमायूं का जीवन परिचय

Humayun’s biography in Hindi

हुमायूं  – शासनकाल -1530-1540, 1555-1556

पूरा नाम (Name) :- नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूं (Humayun)

जन्म (Birthday) :- 6 मार्च, सन् 1508 ई., क़ाबुल

मृत्यु (Death) :- 27 जनवरी, सन् 1555 ई., दिल्ली

पिता (Father Name) :-  बाबर

माता (Mother Name) :-  माहम बेगम

पत्नियां (Wife Name) :- 

चाँद बीबी, हमीदा बानू बेगम, बिगेह बेगम, हाज़ी बेगम, शहज़ादी ख़ानम, बेगा बेगम, मिवेह-जान, माह-चूचक

संतान (Children) पुत्र :-

अकबर, मिर्ज़ा मुहम्मद हाकिम, बख्तुन्निसा बेगम, बख़्शी बानु बेगम, अकीकेह बेगम

मक़बरा :- हुमायूँ का मक़बरा

हुंमायूं का जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

Birth and early life of Humayun in Hindi

हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 ईo को काबुल के किले में हुआ था। हुमायूँ का अर्थ होता है भाग्यशाली। इसका मूल नाम नसीरुद्दीन मुहम्मद ( Nasir ud-Din Muhammad ) था। उनकी मां का नाम माहम बेगम था, बचपन में सब उन्हें नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमांयूं कहकर पुकारते थे। वह बाबर के सबसे बड़े और लाड़ले पुत्र थे। हुंमायूं के तीन भाई कामरान मिर्जा, अस्करी और हिन्दाल थे, जिसके लिए हुंमायूं ने अपने सम्राज्य का बंटबारा कर दिया था, लेकिन बाद में उन्हें इसकी वजह से काफी कुछ भुगतना पड़ा था। मुगल शासक हुंमायू महज 12 साल का था, तब उसे बदख्शां के सूबेदार के रुप में नियुक्त किया गया।

बाबर काबुल के चाहर बाग़ में हुमायूँ के जन्म का उत्सव मनाता था, साम्राज्य का इस तरह से किया गया विभाजन हुमायूँ की भयंकर भूलों में से एक था, जिसके कारण उसे अनेक आन्तरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और कालान्तर में हुमायूँ के भाइयों ने उसका साथ नहीं दिया। वास्तव में अविवेकपूर्णढंग से किया गया साम्राज्य का यह विभाजन, कालान्तर में हुमायूँ के लिए घातक सिद्ध हुआ। यद्यपि उसके सबसे प्रबल शत्रु अफ़ग़ान थे।, किन्तु भाइयों का असहयोग और हुमायूँ की कुछ व्यैक्तिक कमज़ोरियाँ उसकी असफलता का कारण सिद्ध हुईं.

18 वर्ष की अवस्था में इसने पहला युद्ध लड़ा और हामिद खां को पराजित किया। बाबर ने अपनी वसीयत बनाकर अपने साम्राज्य को अपने पुत्रों में बाँट दिया और हुमायूँ को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। बाबर ने हुमायूँ से कहा था की यदि उसके भाई गलती करें तो वह उन्हें माफ़ कर दे। पानीपत की पहली लड़ाई के बाद बाबर ने इसे हिसार फिरोजा बाद में संभल की जागीर दी। खानवा युद्ध के बाद दो वर्ष के लिए हुमायूँ को बादक्शा का प्रशासक नियुक्त किया।

26 दिसम्बर, 1530 ई. को बाबर की मृत्यु के बाद 30 दिसम्बर, 1530 ई. को 23 वर्ष की आयु में हुमायूँ का राज्याभिषेक किया गया। बाबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही हुमायूँ को गद्दी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हुमायूँ को उत्तराधिकार देने के साथ ही साथ बाबर ने विस्तृत साम्राज्य को अपने भाईयों में बाँटने का निर्देश भी दिया था, अतः उसने असकरी को सम्भल, हिन्दाल को मेवात तथा कामरान को पंजाब की सूबेदारी प्रदान की थी।

हुमायूँ ने 29 अगस्त 1541 ईo को हिन्दाल के गुरु मीर अली अकबर जामी की पुत्री हमीदा बानू से विवाह किया। 1542 ईo में अमरकोट के किले में अकबर का जन्म हुआ। इस समय अमरकोट का शासक वीरसाल था।

हुमायूँ 22 वर्ष की अवस्था में 29 दिसंबर 1530 ईo को बादशाह बना। हुमायूँ को साम्राज्य विरासत में मिला वो फूलों की सेज न होकर काँटों का ताज था। क्योंकि बाबर का जीवन संघर्षों और युद्धों में ही बीत गया। बाबर एक अच्छा सेनानायक व योद्धा था परन्तु वह एक अच्छा प्रशासक न था। इसलिए हुमायूँ को जो राज्य मिला वह पूरी तरह से अस्त व्यस्त था।

हुंमायूं ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ावों को देखा था। हुंमायूं को सबसे ज्यादा कष्ट उसके भाईयों से मिला था। वहीं अफगान शत्रुओं ने हुंमायूं की मुसीबतों को और भी ज्यादा बढ़ा दिया था,

हुमायूँ दुसरे मुग़ल शासक थे जिन्होंने उस समय आज के अफगानिस्तान, पकिस्तान और उत्तरी भारत के कुछ भागो पर 1531-1540 तक और फिर दोबारा 1555-1556 तक शासन किया था. उनके पिता बाबर की ही तरह उन्होंने भी अपने साम्राज्य को जल्द ही खो दिया था लेकिन बाद में पर्शिया के सफविद राजवंशियो की सहायता से पुनः हासिल कर लिया था.

1556 में उनकी मृत्यु के समय, मुग़ल साम्राज्य तक़रीबन दस लाख किलोमीटर तक फैला हुआ था. हुमायूँ ने बाद में पश्तून से भी शेर शाह सूरी से हारकर अपने अधिकार को खो दिया था लेकिन बाद में पर्शियन की सहायता से उन्होंने उसे दोबारा हासिल कर लिया था. हुमायूँ ने अपने शासनकाल में मुग़ल दरबार में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी किये थे.

हूंमायूं के उत्तराधिकारी होने की घोषणा एवं राज्याभिषेक

Declaration and coronation of Humayun’s successor in Hindi

बाबर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. को हुई। उसके तीन दिन पूर्व उसने हुमायूं को बुलाया और प्रधान मंत्री निजामुद्दीन खलीफा तथा अन्य अमीरों की उपस्थिति में उसने हुमायूं को सिंहासन पर बिठाते हुए उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा सभी सरदारों को उसे युवराज स्वीकार करने का आदेश दिया। परन्तु इतना होने पर भी बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं तुरंत गद्दी पर बिठाया नहीं गया। इस देरी का कारण प्रधान मंत्री खलीफा का विरोध था।

खलीफा हुमायूं के स्थान पर खानजादा बेगम के पति महदी ख्वाजा को गद्दी देना चाहता था। महदी ख्वाजा प्रायः 20 वर्ष से बाबर की सेना में था। वह एक अनुभवी सैनिक योद्धा था और उसे पानीपत तथा खानुआ के युद्धों में वही सम्मान मिला था जो हुमायूं को। उसकी आयु अधिक होने के कारण उसमें विचारों की प्रौढ़ता तथा शसन की समुचित क्षमता विकसित हो चुकी थी। उसका सामान्य व्यवहार भी दोषरहित था। परन्तु यह षड्यन्त्र बाबर से गुप्त रखा गया। खलीफा को बाद में पता चला कि महदी ख्वाजा उसके प्रति सद्भाव नहीं रखता। अतएव उसे भय हुआ कि उसे राजगद्दी पर बिठाना मृत्यु का वरण करना था। इसलिए खलीफा ने हुमाएं को बुला कर 30 दिसम्बर, 1530 ई. को उसे विधिवत् सम्राट घोषित कर दिया।

मुगल वंश के संस्थापक बाबर की मौत के चार दिन बाद 30 दिसंबर साल 1530 ईसवी में बाबर की इच्छानुसार उनके बड़े बेटे हुंमायूं को मुगल सिंहासन की गद्दी पर बिठाया गया और उनका राज्याभिषेक किया गया। आपको बता दें कि बाबर ने उनके चार पुत्रों में मुगल सम्राज्य को लेकर लड़ाई न हो और अपने अन्य पुत्रों की उत्तराधिकारी बनने की इच्छा जताने से पहले ही अपने जीवित रहते हुए हुंमायूं को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

इसके साथ ही बाबर ने चारों तरफ फैले अपने मुगल सम्राज्य को मजबूत बनाए रखने के लिए हुंमायूं को मुगल सम्राज्य को चारों भाईयों में बांटने के आदेश दिए। जिसके बाद आज्ञाकारी पुत्र हुंमायूं ने अपने मुगल सम्राज्य को चारों भाईयों में बांट दिया। उसने अपने भाई कामरान मिर्जा को पंजाब, कांधार, काबुल, हिन्दाल को अलवर और असकरी को सम्भल की सूबेदारी प्रदान की दिया, यही नहीं हुंमायूं ने अपने चचेरे भाई सुलेमान मिर्जा को बदखशा की जागीर सौंपी।

हालांकि, हुंमायूं द्धारा भाईयों को जागीर सौंपने का फैसला उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ। इसकी वजह से उसे अपनी जिंदगी में कई बड़ी मुसीबतों का भी सामना करना पड़ा। वहीं उसका सौतेला भाई कामरान मिर्जा उसका बड़ा प्रतिद्धन्दी बना। हालांकि, हुंमायूं का अफगान शासको से कट्टर दुश्मनी थी, वहीं अफगान शासकों से लड़ाई में भी उसके भाईयों ने कभी सहयोग नहीं दिया जिससे बाद में हुंमायूं को असफलता हाथ लगी।

हुंमायूं का विजय अभियान

Humayun’s Victory Campaign in Hindi

हुमायूं ने अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में साल 1531 से 1540 तक शासन किया था, फिर दोबारा साल 1555 से 1556 तक शासन किया था। वहीं मुगल सम्राज्य का विस्तार पूरी दुनिया में करने के मकसद को लेकर हुंमायूं ने अपनी कुशल सैन्य प्रतिभा के चलते कई राज्यों में विजय अभियान चलाया। वहीं इन अभियानों के तहत उसने कई राज्यों में जीत का परचम भी लहराया था।

कालिंजर का अभियान

Kalinjar’s Campaign in Hindi

राज्याभिषेक के पश्चात् छह मास के भीतर हुमायू बुन्देलखण्ड के कालिंजर दुर्ग को घेरने के लिए चल पड़ा। साल 1531 में गुजरात के शासक बहादुर शाह की लगातार बढ़ रही शक्ति को रोकने के लिए मुगल सम्राट हुंमायूं ने कालिंजर पर हमला किया। वहीं इस दौरान अफगान सरदार महमूद लोदी के जौनपुर और बिहार की तरफ आगे बढ़ने की खबर मिलते ही हुंमायूं गुजरात के शासक से कुछ पैसे लेकर वापस जौनपुर की तरफ चला गया। जिसके बाद दोनों के बीच युद्द हुआ।

दुर्ग के शासक को अफगानों का शुभचिन्तक समझा जाता था। यह घेरा कुछ महीनों तक पड़ा रहा और अंत में हुमायूं को सुलह करनी पड़ी। उसने राजा से जन-धन की हानि का मुआवजा लिया ताकि शीघ्र ही पूर्व में अफगानों के उपद्रव का सामना करने के लिए वहां से चल दे। कालिंजर का अभियान एक बड़ी भूल थी। राजा को पराजित न किया जा सका और हुमायूं अपने लक्ष्य की पूर्ति में असफल रहा। राजा आसानी से अपनी तरफ मिला लिया जा सकता था और उसको मित्र भी बनाया जा सकता था।

दौहारिया का युद्ध

Battle Of Dauhariya in Hindi

साल 1532 में अफगान सरदार महमूद लोदी और हुंमायूं की विशाल सेना के बीच दौहारिया नामक स्थान के बीच युद्ध हुआ, इस युद्ध में हुंमायूं के पराक्रम के आगे महमूद लोदी नहीं टिक पाया और उसे हार का मुंह देखना पड़ा। वहीं इस युद्द को दौहारिया का युद्ध कहा गया।

मालवा एवं गुजरात के शासकों के साथ संघर्ष (1535-36 ई.)

Conflict with the rulers of Malwa and Gujarat in Hindi

मालवा मध्य युग में एक महत्त्वपूर्ण भाग समझा जाता था। गुजरात, मेवाड तथा दिल्ली के शासकों के बीच मालवा को लेकर बराबर संघर्ष बना रहता था। बाबर शासक था। बाबर की मृत्यु के पश्चात् सुल्तान महमूद ने राणा सांगा द्वारा अधिकृत स्थानों पर अधिकार करने तथा गुजरात की गद्दी पर बहादुरशाह के भाई चॉदों को बैठाने की योजना बनाई। बहादुरशाह ने इससे लाभ उठा कर मालवा पर आक्रमण किया, तथा 1531 ई. में उसने मालवा को अपने राज्य में मिला लिया। इस तरह हुमायूं के राज्य रोहण के प्रथम वर्ष ही मालवा पर बहादुरशाह का अधिकार हो गया।

हुमायूं के गद्दी पर बैठने के समय गुजरात पर बहादुरशाह शासन करता था, यह एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था उसने दो तुर्की विशेषज्ञों की सहायता से अपना तोपखाना शक्तिशाली तथा मजबूत कर लिया था। उसकी सेना में लगभग 10 हजार विदेशी सैनिक थे। हिन्दुओं के साथ ही उसका व्यवहार अच्छा था, थोड़े ही दिनों में वह जनप्रिय शासक बन गया, उसने निकट के भागों पर अधिकार कर अपनी शक्ति को और बढ़ा लिया

मुगल सम्राट हुंमायूं और गुजरात के शासक बहादुर शाह के बीच संघर्ष

Conflict between Mughal Emperor Humayun and Gujarat’s ruler Bahadur Shah in Hindi

गुजरात के शासक बहादुर शाह ने 1531 ईसवी में मालवा तथा 1532 ई. में ‘रायसीन’ के महत्वपूर्ण क़िले पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने मेवाड़ को संधि करने के लिए मजबूर किया। वहीं इस दौरान गुजरात के शासन बहादुर शाह ने टर्की के एक प्रख्यात एवं कुशल तोपची रूमी ख़ाँ की मद्द से एक शानदार तोपखाने का निर्माण भी करवाया था।

जिसके बाद हुंमायूं ने बहादुरशाह की बढ़ती हुई शक्ति को दबाने के लिए साल 1535 ई. में बहादुरशाह पर ‘सारंगपुर’ में आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच हुए इस संघर्ष में गुजरात के शासक बहादुर शाह को मुगल सम्राट हुंमायूं से हार का सामना करना पड़ा था।

इस तरह हुंमायूं ने माण्डू और चंपानेर के किलों पर भी अपना अधिकार जमा लिया और मालवा और गुजरात को उसने मुगल सम्राज्य में शामिल करने में सफलता हासिल की।

हुंमायूं का शेरशाह से युद्ध

Humayun’s war with Sher Shah in Hindi

वहीं दूसरी तरफ शेर खां ने ‘सूरजगढ़ के राज’ में बंगाल को जीतकर काफ़ी ख्याति प्राप्त की, जिससे हुंमायूं की चिंता और अधिक बढ़ गई। इसके बाद हुंमायूं ने शेर खां को सबक सिखाने और उसकी शक्ति को दबाने के उद्देश्य से साल 1538 में चुमानगढ़ के किला पर घेरा डाला और अपने साहस और पराक्रम के बलबूते पर उस पर अपना अधिकार जमा लिया।

हालांकि, शेर ख़ाँ (शेरशाह) के बेटे कुतुब ख़ाँ ने हुमायूँ को करीब 6 महीने तक इस किले पर अधिकार जमाने के लिए उसे काफी परेशान किया था और उसे कब्जा नहीं करने दिया था, लेकिन बाद में हुंमायूं के कूटनीति के सामने कुतुब खां को घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ा था।

इसके बाद 1538 ईसवी अपने विजय अभियान को आगे बढ़ाते हुए मुगल शासक हुंमायूं, बंगाल के गौड़ क्षेत्र में पहुंचा, जहां उसने चारों तरफ लाशों का मंजर देखा और अजीब से मनहूसियत महसूस की। इसके बाद हुंमायूं ने इस स्थान का फिर से निर्मण कर इसका नाम जन्नताबाद रख दिया।

वहीं बंगाल से लौटते समय हुमायूँ एवं शेरखाँ के बीच बक्सर के पास 29 जून, 1539 को चौसा नामक जगह पर युद्ध हुआ, जिसमें हुमायूँ परास्त हुआ।

हुमायूँ का बंगाल अभियान

Humayun’s Bengal Campaign in Hindi

जैसे ही हुमायूं को शेरखाँ के अभियान की सूचना मिली, उसने बंगाल पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। आक्रमण से पहले उसने दिल्ली, आगरा आदि अनेक स्थानों का समुचित प्रबंध किया और हिन्दाल के साथ 27 जुलाई, 1537 ई. को आगरा से रवाना हुआ। उसके साथ उसकी बेगमें तथा साम्राज्य के प्रमुख अमीर रूमीखाँ, तीबग, बैरमखाँ, कासिम हुसैनखाँ, जाहिद बेग, जहाँगीर कुलीबेग इत्यादि थे। अधिकतर अमीर नदी के मार्ग से रवाना हुए,

किन्तु सेना का मुख्य भाग स्थल मार्ग से चला। हुमायूं कभी जल मार्ग से नाव पर चलता था तथा कभी घोड़े पर स्थल मार्ग से। हुमायूं के आक्रमण की सूचना पाते ही शेरखाँ ने इसका प्रतिवाद किया और कहा कि उसने मुगलों के विरूद्ध कोई कार्य नहीं किया। पर हुमायूं ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया और आगे बढ़ गया। हुमायूं के अभियान से शेरखाँ चिंतित हुआ। उसने गौड़ के घेरे का प्रयत्न किया तथा वहां ख्वासखों को नियुक्त किया। चुनार के दुर्ग की रक्षा का उत्तरदायित्व उसने अपने पुत्र कुतुबखाँ तथा अन्य अफगानों को सौंपा। शेरखाँ स्वयं भरकुण्डा में अफगान परिवारों के साथ चला गया। बाहर से वह दोनों दुर्गों पर तथा हुमायूं की गतिविधि पर दृष्टि रख सकता था। आगरा से चलकर हुमायूं 1537 ई. में चुनार पहुंचा।

चौसा का युद्ध (25 जून 1539 ईo)

Battle of Chausa in Hindi

यह गंगा व कर्मनाशा नदी के बीच का क्षेत्र है जहाँ पर हुमायूँ व शेरशाह के बीच युद्ध हुआ। इसी युद्ध के बाद शेरखां ने शेरशाह की उपाधि धारण की। इस युद्ध में हुमायूँ की हार हुयी। इसी युद्ध के बाद निजाम भिश्ती ने हुमायूँ की जान बचाई। बाद में हुमायूँ ने इसे कुछ समय के लिए राजा बना दिया था। फरिश्ता के अनुसार आधे दिन के लिए। जौहर आफ़तावची के अनुसार दो घंटे के लिए। गुलबदन बेगम के अनुसार दो दिन के लिए भिश्ती को राजा बनाया था।

बनारस विजय तथा शेरखाँ से सन्धि वार्ता

Treaty talks with Banaras Vijay and Sher Khan in Hindi

चुनार पर अधिकार करने के बाद हुमायूं ने बनारस पर अधिकार कर लिया, तत्पश्चात् मुगल सेना आगे बढ़कर सोन नदी के तट पर मनेर पहुंची। जौहर के अनुसार उसका इरादा भरकुण्डा के दुर्ग की तरफ जाने का था जहां से शेरखाँ बंगाल तथा बिहार की सेनाओं को नियंत्रित कर रहा था। लेकिन मनेर पहुंच कर हुमायूं ने शेरखाँ से सन्धि करने का विचार किया, जबकि चुनार विजय के बाद अफगानों को पराजित करने का संकल्प करना चाहिए था। जिसके लिए हुमायूं ने काबुल हुसैन तुर्कमान को अपना दूत बनाकर भेजा तथा उसने सन्धि की निम्नलिखित शर्ते रखीं-

  • शेरखाँ मुगलों की सेवा में हाजिर होगा।
  • बंगाल के शासन से प्राप्त राजछत्र तथा अन्य राज्य चिन्ह मुगल सम्राट को देगा।
  • रोहतास तथा बंगाल से अपने अधिकारों को त्याग देगा।
  • चुनार, जीनपुर या जो अन्य जागीर शेरखाँ पसन्द करे उसे प्राप्त होगी।

पर शेरखों जैसे व्यक्ति के लिए इन उपर्युक्त शर्तों को मानना असंभव था। अतः शेरखाँ ने कूटनीति का उत्तर कूटनीति में ही देने का विचार किया, क्योंकि इन शर्तों को स्वीकार करने का अर्थ यह था कि अफगान संगठन नष्ट हो जाय और पूर्ण रूप से मुगलों के आधीन हो जाए। सन्धि की शर्तों को ठुकरा देने पर युद्ध की संभावना थी जिसके लिए शेरखाँ तैयार नहीं था क्योंकि गौड़ में प्राप्त धन को वह हटाना चाहता था। अतः शेरखाँ ने हुमायूं के प्रस्ताव के विरोध में दूसरा प्रस्ताव रखा जिसमें शेरखाँ ने मुगल सम्राट को प्रति वर्ष 10 लाख रुपया, बिहार प्रदेश समर्पित करने का वचन दिया और स्वामिभक्त बने रहने का आश्वासन दिया।

कन्नौज / बिलग्राम की लड़ाई, हार (17 मई 1540) और निर्वासित जीवन

Battle of Kannauj/Bilgram in Hindi

इस युद्ध में हुमायूँ हार गया और निर्वासित हो गया। कन्नौज से हारने के बाद वह क्रमशः आगरा, दिल्ली और सिंध गया। बाद में बैरम खां की सलाह पर वह ईरान के शाह तहमास्प के दरबार में पहुँचा। यहाँ पर उसने शिया धर्म स्वीकार कर लिया। हुमायूँ ने तहमास्प से संधि की कि वह कांधार विजित कर उसे दे देगा। 1545 ईo में उसने कांधार जीतकर शाह को दे दिया। आगे शाह ने काबुल व गजनी को जीतने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। तब हुमायूँ ने कांधार को पुनः अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके बाद उसने काबुल जीता। इसी समय हुमायूँ की तरफ से युद्ध करते हुए हिन्दाल मारा गया।

हुंमायूं की फिर से सत्ता मे वापसी

Humayun’s return to power again in Hindi

करीब 14 साल काबुल में बिताने के बाद साल 1545 ईसवी में मुगल सम्राट हुमायूं ने काबुल और कंधार पर अपनी कुशल रणनीतियों द्धारा फिर से अपना अधिकार जमा लिया। वहीं हिंदुस्तान के तल्ख पर फिर से राज करने के लिए 1554 ईसवी में हुमायूं अपनी भरोसेमंद सेना के साथ पेशावर पहुंचा, और फिर अपने पूरे जोश के साथ उसने 1555 ईसवी में लाहौर पर दोबारा अधिकार कर जीत का फतवा लहराया।

मच्छिवारा और सरहिन्द का युद्ध

Battle of Machhiwara and Sirhind in Hindi

इसके बाद मुगल सम्राट हुंमायूं और अफगान सरदार नसीब खां एवं तांतर खां के बीच सतलुज नदी के पास ‘मच्छीवारा’ नामक जगह पर युद्ध हुआ। इस युद्द में भी हुंमायूं ने जीत हासिल की और इस तरह पूरे पंजाब पर मुगलों का अधिकार जमाने में सफल हुआ।

इसके बाद 15 मई 1555 ईसवी को ही मुगलों और अफगानों के बीच सरहिन्द नामक जगह पर भीषण संघर्ष हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खाँ ने और अफगान सेना का नेतृत्व सिकंदर सूर ने किया। हालांकि इस संघर्ष में अफगान सेना को मुगल सेना से हार खानी पड़ी। और फिर 23 जुलाई, साल 1555 में मुगल सम्राट हुंमायूं, दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए। इस तरह मुगलों ने एक बार फिर अपने सम्राज्य स्थापित कर लिया और हिंदुस्तान में मुगलों का डंका बजा।

हुमायूँ की पुनर्वापसी

Humayun’s return in Hindi

भारत पर पुनः अपनी सत्ता को स्थापित करने के उद्देश्य से हुमायूं ने अपनी सेना को सुसंगठित किया। इस कार्य में उसे अपने परम विश्वासपात्र अधिकारी वैरम खां तथा अनेक सैनिक अधिकारियों का सहयोग प्राप्त हुआ। कालानौर नामक स्थान पर उसने अपनी फौज को तीन भागों में विभाजित कर उनमें से एक को सिहाबुद्दीन के नेतृत्व में लाहौर की ओर भेजा तथा दूसरे को बैरंग खां के नेतृत्व में हरियाणा क्षेत्र के अफगान प्रधान नवीव खां को पराजित करने के लिए भेजा। 24 फरवरी, 1555 ई. को मुगल सेना बिना किसी प्रतिरोध के लाहौर में प्रवेश कर गयी। मुगलों ने सहबाज खां को पराजित कर दिपालपुर तथा नसिब खां को हराकर हरियाणा पर भी अपना अधिकार कर लिया। अब पंजाब, सरहिन्द, दिपालपुर, हिसार, हरियाणा आदि के क्षेत्र पूर्ण रूप से हुमायूं के कब्जे में आ गये। मुगलों की विजयी सेना हर्ष के साथ दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से आगे बढ़ी।।

सन 1555 ईo में सेनापति व प्रधानमंत्री बैरम खां की सलाह पर हुमायूँ ने पुनर्वापसी की। पंजाब के शासक सिकंदर सूर के सेनापति तातार खां को पराजित कर रोहतास के दुर्ग को जीता। इसके बाद 15 मई 1555 को मच्छीवाडा के युद्ध में विजय प्राप्त की। 22 जून 1555 ईo को सरहिंद के युद्ध में पंजाब के शासक सिकंदर सूर को हराया। इसी समय अकबर को युवराज घोषित कर पंजाब का सूबेदार बनाया। 23 जुलाई 1555 ईo को हुमायूँ ने दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली विजय के बाद अकबर को लाहौर का सूबेदार बनाया गया। इसके बाद आगरा पर भी अधिकार कर लिया गया।

हुंमायूं की मृत्यु

Humayun Death in Hindi

दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद हुंमायूं ज्यादा दिनों तक सत्ता का सुख नहीं उठा सकता है। 24 जनवरी, 1556 ई. को जब अपनी पुस्तकालय में हुमायूं अजान का शब्द सुनकर तेजी से पुस्तकालय की सीढ़ियों से उतरने लगा तो उसके पैर फिसल गये और वहां से गिर जाने के कारण उसको इतनी गहरी चोट आयी कि 27 जनवरी को संध्याकाल में उसकी मृत्यु हो गयी।

वहीं हुंमायूं की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अकबर ने मुगल सिंहासन संभाला। उस समय अकबर की उम्र महज 13-14 साल थी, इसलिए बैरम खां को अकबर का संरक्षक नियुक्त किया गया। इसके बाद अकबर ने मुगल सम्राज्य को मजबूती प्रदान की और लगभग पूरे भारत में मुगलों का सम्राज्य स्थापित किया।

वहीं उनके मौत के कुछ दिनों बाद उनकी बेगम हमीदा बानू ने “हुंमायूं के मकबरा” का निर्माण करवाया जो कि आज दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों में से एक है, और यह मुगलकालीन वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है। इस तरह मुगल सम्राट हुंमायू के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन हुंमायूं अपनी पराजय से निराश नहीं हुए बल्कि आगे बढ़ते रहे और एक बार फिर से अपने खोए हुए सम्राज्य को हासिल करने में सफल रहे।

हुंमायू के जीवन से यही प्रेरणा मिलती है कि कठिनाइयों का डटकर सामना करने वालों को अपने जीवन में सफलता जरूर नसीब होती है। इसलिए अपने लक्ष्य की तरफ बिना रुके बढ़ते रहना चाहिए। हुमायूँ के बारे में इतिहासकार लेनपुल ने कहा है की,

“हुमायूँ गिरते पड़ते इस जीवन से मुक्त हो गया, ठीक उसी तरह, जिस तरह तमाम जिन्दगी गिरते पड़ते चलता रहा था”

हुंमायूं से जुड़े प्रमुख तथ्य

Important facts about Humayun in Hindi

तो आइए हुंमायूं से जुड़े प्रमुख तथ्य (Important facts about Humayun in Hindi) को जानते है :-

  • हुमायूँ का जन्म 6 मार्च, 1508 ई० को माहिम बेगम के गर्भ से हुआ।
  • 1520 ई० में मात्र 12 वर्ष की आयु में हुमायूँ को बदख्शां के सूबेदार के पद पर नियुक्त किया गया।
  • बाबर की मृत्यु के बाद 30 दिसंबर, 1530 ई० को हुमायूँ मुगलों की गद्दी पर आरूढ़ हुआ।
  • 1531 ईo में अपने पहले अभियान में कालिंजर के चंदेल शासक प्रताप रुद्रदेव को हराया।
  • हुमायूँ ने सिंहासनारूढ़ होने के पश्चात अपने साम्राज्य के विभिन्न हिस्से अपने तीन भाईयों को बांट दिये-कामरान-काबुल, कंधार एवं पंजाब, अस्करी-सम्भल एवं हिन्दाल-मेवाड़ एवं अलवर।
  • 1533 ईo में दीनपनाह नगर की स्थापना की थी।
  • हुमायूँ द्वारा अपने चचेरे भाई सुलेमान मिर्जा को बदख्शां का सूबेदार बनाया गया।
  • अफगान शासक शेर खाँ ने हुमायूँ को चौसा (25 जून, 1539 को) एवं बिलग्राम या कन्नौज (10 मई, 1540 ई०) के युद्धों में बुरी तरह परास्त किया एवं आगरा तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
  • उपरोक्त पराजयों के पश्चात 15 वर्षों तक हुमायूँ को निर्वासित जीवन जीना पड़ा। उसी दौरान उसने हमीदन बेगम से 29 अगस्त, 1541 ई० को निकाह किया।
  • हमीदन बेगम से 1542 ई० में उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम उसने जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखा।
  • 1555 ई० में मच्छिवारा (लुधियाना से 9 मील पूर्व) के युद्ध में सिकंदर सूर को परास्त कर दिल्ली की गद्दी पर पुनः कब्जा कर लिया।
  • हुमायूँ द्वारा 1533 ई० में दीनपनाह नामक एक नये भवन की स्थापना की गई।
  • 27 जनवरी, 1556 ई० को दीनपनाह भवन की सीढ़ियों से गिरकर हुमायूँ की मृत्यु हो गई।
  • गुलबदन बेगम (हुमायूँ की बहन) ने हुमायूँनामा की रचना की।
  • हुमायूँ ज्योतिष में विश्वास करता था और सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग रंग के कपड़े पहनता था।

तो आपको यह पोस्ट हुमायूं का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु (History of Humayun in Hindi Humayun Biography Jeevan Parichay Date Of Birth, Birth Place, Father, Mother, Wife Children, Fight, Mughal Empire) कैसा लगा कमेंट मे जरूर बताए और इस पोस्ट को लोगो के साथ शेयर भी जरूर करे…

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