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जहांगीर का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु | History of Jahangir in Hindi

आज के इस पोस्ट मे जहांगीर का इतिहास History of Jahangir in Hindi के बारे मे जानेगे। वैसे तो हिंदुस्तान में सालो तक राज करने वाले मुगलो के इतिहास की कई घटनाये प्रमुख है तो चलिये यहा जहांगीर का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु | History of Akbar in Hindi Jahangir Biography Jeevan Parichay Date Of Birth, Birth Place, Father, Mother, Wife Children, Fight, Mughal Empire Death जानेगे.

जहांगीर का इतिहास जीवन परिचय पत्नी युद्ध शासनकाल और मृत्यु की पूरी जानकारी

History of Jahangir in Hindi

History of Jahangir in Hindiजहांगीर एक रंगीन मिजाज का बेहद शौकीन मुगल बादशाह था, जिसके शान-ओ-शौकत के चर्चे काफी मशहूर थे। हालांकि, मुगल सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपनी कई बुरी आदतों को छोड़ दिया था। जहांगीर का वास्तविक नाम सलीम था, जिसे बाद में जहांगीर की उपाधि दी गई थी। जिसका मतलब था- दुनिया को जीतने वाला।

जहांगीर प्रख्यात मुगल शासकों में से एक था, जिसने कई सालों तक मुगल साम्राज्य को संभाला था, और एक अच्छे मुगल सम्राट की तरह मुगल साम्राज्य का विस्तार किया था। जहांगीर ने किश्वर और कांगड़ा के अलावा बंगाल तक अपने साम्राज्य का जमकर विस्तार किया था, हालांकि जहांगीर के शासनकाल में कोई बड़ी लड़ाई या कोई बड़ी उपलब्धि शामिल नहीं है।

मुगल सम्राट जहांगीर को आगरा में बनी “न्याय की जंजीर” के लिए भी याद किया जाता है। क्योंकि जहांगीर ने सोने की  एक जंजीर लगवाई थी जो आगरा के किले के साहवुर्ज एवं यमुना तट पर स्थित पत्थर के खंभे में लगवाई हुई थी। जिसे फरियादी महल में न पहुंचने की दशा में बजाता था जिससे बादशाह को फरियादी की सूचना मिल जाती थी।

तो चलिये जहांगीर का इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण, मुगल बादशाह जहांगीर की जीवनी, Jahangir History in Hindi, Jahangir Father Name, Jahangir Biography in Hindi, Jahangir History (Itihas) Biography in Hindi Language, History of Mughal Emperor Jahangir in Hindi को जानते है –

मुगल शासक जहाँगीर का जीवन परीचय

Mughal Emperor Jahangir biography in Hindi

पूरा नाम (Name) :- मिर्जा नूर-उद-दीन बेग मोहम्मद खान सलीम

जन्म तिथि (Birthday) :-  31 अगस्त 1569, फतेहपुर सीकरी, मुगल साम्राज्य

मृत्यु तिथि (Death) :- 28 अक्टूबर 1627, राजोरी, कश्मीर

पिता (Father Name) :-   अकबर

माता (Mother Name) :-  मरियम

पत्नी (Wife Name) :- नूर जहां, साहिब जमाल, जगत गोसेन, मलिक जहां, शाह बेगम, खास महल, करमसी, सलिहा बानु बेगम, नूर-अन-निसा बेगम,

बच्चे (Children) :- खुसरो मिर्जा, खुर्रम मिर्जा (शाहजहां), परविज मिर्जा, शाहरियर मिर्जा, जहांदर मिर्जा, इफत बानू बेगम, बहार बानू बेगम, बेगम सुल्तान बेगम, सुल्तान-अन-निसा बेगम, दौलत-अन-निसा बेगम।

जहाँगीर का जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

Birth and early life of Jahangir in Hindi

मुगल सम्राट जहांगीर 31 अगस्त, 1569 को मुगल सम्राट अकबर के बेटे के रुप में फतेहपुर सीकरी में स्थित शेख सलीम चिश्ती की कुटिया में जन्में थे। जहांगीर की माता का नाम मरियम उज्जमानी था। सलीम से पहले अकबर की कोई भी संतानें जीवित नहीं बचती थी, जिसके चलते सम्राट अकबर ने काफी मिन्नतें कीं और फिर बाद सलीम का जन्म हुआ था। जहांगीर को बचपन में सब उन्हें सब सुल्तान मुहम्मद सलीम कहकर पुकारते थे।

जहांगीर की शिक्षा

Jahangir education in Hindi

आपको बता दें कि मुगल सम्राट अकबर ने अपने पुत्र का नाम फतेहपुर सीकरी के शेख सलीम चिश्ती के नाम पर उनका नाम रखा था। मुगल सम्राट अकबर ने, अपने बेटे जहांगीर को बेहद कम उम्र से ही सैन्य और साहित्य में निपुण बनाने के प्रयास शुरु कर दिए थे। जब वे महज 4 साल के थे, तब सम्राट अकबर ने उनके लिए बैरम खां के पुत्र अब्दुल रहीम खान-ए-खाना जैसे विद्धान शिक्षक नियुक्त किया।

जिससे जहांगीर ने इतिहास, अंकगणित, भूगोल, अरबी, फारसी, और विज्ञान की शिक्षा ग्रहण की थी, जिसकी वजह से जहांगीर अरबी और फारसी में विद्धान हो गया था। इतिहासकारों के मुताबिक सम्राट अकबर के साथ जहांगीर के रिश्ते अच्छे नहीं थे।

जहांगीर ने सत्ता समेत कई कारणों के चलते कई बार अपने पिता अकबर के खिलाफ षणयंत्र भी रचा और विद्रोह करने की कोशिश की लेकिन फिर बाद में दोनों पिता-पुत्र में आपस में समझौता कर लिया था। हालांकि अकबर की मृत्यु के बाद जहांगीर को मुगल सिंहासन का राजपाठ सौंपा गया था।

जहांगीर का विवाह और बच्चे

Jahangir’s marriage and children in Hindi

अकबर का इकलौता वारिस होने के कारण और वैभव-विलास में पालन-पोषण की वजह से जहांगीर एक बेहद शौकीन और रंगीन मिजाज का शासक था, जिसने करीब 20 शादियां की थी, हालांकि उनकी सबसे चहेती और पसंदीदा बेगम नूर जहां थीं। वहीं उनकी कई शादियां राजनीतिक कारणों से भी हुईं थी।

16 साल की उम्र में जहांगीर की पहली शादी आमेर के राजा भगवान राज की राजकुमारी मानबाई से हुई थी। जिनसे उन्हें दो बेटों की प्राप्ति हुई थी। वहीं जहांगीर के बड़े बेटे खुसरो मिर्जा के जन्म के समय मुगल सम्राट जहांगीर ने अपनी पत्नी मानबाई को शाही बेगम की उपाधि प्रदान की थी।

इसके बाद जहांगीर कई अलग-अलग राजकुमारियों से उनकी सुंदरता पर मोहित होकर शादी की। साल 1586 में जहांगीर ने उदय सिंह की पुत्री जगत गोसन की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह किया। जिनसे उन्हें दो पुत्र और दो पुत्रियां पैदा हुईं।

हालांकि, इनमें से सिर्फ एक ही पुत्र खुर्रम जीवित रह सका, अन्य संतान की बचपन में ही मौत हो गई। बाद में उनका यही पुत्र सम्राट शाहजहां के रुप में मुगल सिंहासन पर बैठा और मुगल साम्राज्य का जमकर विस्तार किया, वहीं शाहजहां को लोग आज भी सात आश्चर्यों में से एक ताजमहल के निर्माण के लिए याद करते हैं।

जहांगीर के अपनी सभी पत्नियों से पांच बेटे खुसरो मिर्जा, खुर्रम मिर्जा (शाहजहां), परविज मिर्जा, शाहरियर मिर्जा, जहांदर मिर्जा और इफत बानू बेगम, बहार बानू बेगम, बेगम सुल्तान बेगम, सुल्तान-अन-निसा बेगम,दौलत-अन-निसा बेगम नाम की पुत्रियां थी।

जहांगीर का राज्याभिषेक

coronation of Jahangir in Hindi

सन 1599 ई. तक सलीम अपनी महत्वाकांक्षा के कारण अकबर के विरुद्ध विद्रोह में संलग्न रहा। 21, अक्टूबर 1605 ई. को अकबर ने सलीम को अपनी पगड़ी एवं कटार से सुशोभित कर उत्तराधिकारी घोषित किया।

अकबर की मृत्यु के आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को सलीम का राज्याभिषेक ‘नुरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह ग़ाज़ी’ की उपाधि से आगरा के क़िले में सम्पन्न हुआ।

मुगल शासक के रुप जहांगीर

Jahangir as Mughal Emperor in Hindi

साल 1605 में अकबर की मृत्यु के बाद सुल्तान सलीम को मुगल ‘बादशाह’ का ताज पहनाया गया और उन्हें जहाँगीर नाम की उपाधि दी गई। वहीं जब मुगल शासक जहांगीर की उम्र 36 साल की थी, तब उन्हें मुगल साम्राज्य की जिम्मेदारी एक आदर्श शासक के रुप में संभाली और कई सालों तक मुगल सिंहासन संभाला।

उन्होंने अपने शासनकाल में मुगल साम्राज्य का जमकर विस्तार किया और विजय अभियान चलाया। वहीं जो क्षेत्र उनके पिता अकबर द्धारा नहीं हासिल किए गए थे, उन्होंने सबसे पहले ऐसे निर्विवाद क्षेत्रों को जीतने के प्रयास किए। मुगल सम्राट जहांगीर ने अपना सबसे पहला सैन्य अभियान मेवाड़ के शासक अमर सिंह के खिलाफ चलाया।

जिसके बाद अमर सिंह को जहांगीर के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा और फिर दोनों शासकों के बीच साल 1615 ईसवी में शांति संधि हुई।

मेवाड़ में मुगल साम्राज्य का विस्तार करने के बाद अपना विजय अभियान चलाते हुए, जहांगीर ने दक्षिण भारत में मुगलों का आधिपत्य जमाने के मकसद से दक्षिण में फोकस करना शुरु किया।

 हालांकि वे इस पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण करने में तो कामयाब नहीं हो सके, लेकिन उनके सफल प्रयासों से बीजापुर के शासक, अहमदनगर और मुगल साम्राज्य के बीच शांति समझौता किया गया, जिसके बाद कुछ किले और बालाघाट के क्षेत्र मुगलों को दे दिए गए।

जबकि जहांगीर ने अपने पुत्र खुर्रम उर्फ शाहजहां के नेतृत्व में साल 1615 में उत्तरी भारत में मुगल साम्राज्य का विस्तार किया। इस दौरान उनकी सेना ने कांगड़ा के राजा को हार की धूल चटाई और अपने विजयी अभियानों को दक्करन तक आगे बढ़ाया। इस तरह मुगल साम्राज्य का विस्तार होता चला गया।

अपने बेटे खुसरों के खिलाफ विद्रोह और पांचवे सिख गुरु की हत्या

Rebellion against his son Khusrau and the assassination of the fifth Sikh Guru in Hindi

मुगल सम्राट जहांगीर जब मुगल सिंहासन की बागडोर संभाल रहे थे, तभी उनके सबसे बड़े बेटे खुसरो ने सत्ता पाने के लालच में अपने पिता जहांगीर पर 1606 ईसवी में षणयंत्र रच आक्रमण करने का फैसला लिया था। जिसके बाद जहांगीर की सेना और खुसरो मिर्जा के बीच जलांधर के पास युद्ध हुआ और जहांगीर की सेना खुसरो को हराने में सफल रही और इसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया।

इसके कुछ समय बाद ही खुसरो की मृत्यु हो गई थी। वहीं जहांगीर को जब पता चला कि खुसरो द्धारा उनके खिलाफ विद्रोह में सिक्खों के 5वें गुरु अर्जुन देव ने मद्द की है, तो उन्होंने अर्जुन देव की हत्या करवा दी।

न्याय की जंजीर के लिए जहांगीर को किया जाता है याद

Jahangir is remembered for the chain of justice in Hindi

जहांगीर ने कुशल और आदर्श शासक के रुप में अपने शासनकाल में न्याय व्यवस्था को ठीक करने के भी उचित कदम उठाए। जहांगीर जनता के कष्टों और मामलों को खुद भी सुनता था। और उनकी समस्याओं का हल करने की पूरी कोशिश करता था, एवं उन्हें न्याय दिलवाता था।

इसके लिए जहांगीर ने आगरे के किले शाहबुर्ज और यमुना तट पर स्थित पत्थर के खंबे में एक सोने की जंजीर बंधवाई थीं जिसमें करीब 60 घंटियां भी लटकी हुई थी, जो कि “न्याय की जंजीर” के रुप में प्रसिद्ध हुई। दरअसल, कोई भी फरियादी मुश्किल के समय इस जंजीर को पकड़कर खींच सकता था और सम्राट जहांगीर से न्याय की गुहार लगा सकता था।

करीब 40 गज लंबी इस “न्याय की जंजीर” को बनवाने में काफी ज्यादा लागत खर्च हुई थी। वहीं जहांगीर को न्याय की जंजीर के लिए आज भी याद किया जाता है।

जहांगीर की पसंदीदा बेगम नूरजहां से रिश्ते

Relationship with Jahangir favorite Begum Noor Jahan in Hindi

ऐसा कहा जाता है कि जब पहली बार मुगल सम्राट जहांगीर ने मिर्जा ग्यास बेद की बेटी मेहरून्निसा उर्फ नूरजहां को देखा था। तो वे उनकी खूबसूरती से इतने मोहित हो गए थे, कि उन्होंने उनसे निकाह करने का फैसला लिया था। आपको बता दें कि मेहरून्निसा को अपने पति अलीकुली बेग की मौत के बाद अकबर की विधवा सलीमा बेगम की सेवा के लिए नियुक्त किया गया था।

1611 ईसवी में सम्राट जहांगीर ने मेहरून्निसा की खूबसूरती पर लट्टू पर विधवा मेहरुन्निसा से शादी कर ली। वहीं शादी के बाद सम्राट जहांगीर ने उसे नूरमहल और नूरजहां की उपाधि दी थी। इसके साथ ही जहांगीर ने अपने राज्य की सारी शक्तियां भी नूरजहां बेगम के हाथों में सौंप दी थी।

नूरजहां को इतिहास में एक साहसी महिला के रुप में भी जाना जाता है, क्योंकि वह जहांगीर के साथ उनके राजकाज में हाथ बंटाती थी, वहीं जहांगीर अपने शासनकाल में सभी महत्वपूर्ण फैसलें नूरजहां की सलाह से ही लेता था। वहीं 1626 ईसवी में नूरजहां बेगम ने इतमाद-उद-दौला का मकबरे का निर्माण करवाया था, यह मुगलकालीन वास्तुकला से बनाई गई पहली ऐसी इमारत थी जो सफेद संगमरमर से बनी थी।

जहांगीर और अनारकली के किस्से

Tales of Jahangir and Anarkali in Hindi

जहाँगीर से एक घटना भी जुड़ी है जो अनारकली से प्रेम की घटना है, इसे आपने फिल्मों में भी देखा या सुना होगा की अनारकली और जहाँगीर ( सलीम ) के बीच प्रेम था और अकबर उसका विरोधी था, इस घटना के संबंध में कई कहानियाँ प्रचलित है, परंतु एक असली कहानी जो दिखाई पड़ती है वो यह है की सलीम ( जहाँगीर ) छोटा था यानी 12-13 वर्ष की आयु का और अकबर के दरबार में एक नृत्यांगना थी जिसका नाम था अनारकली।

सलीम ( जहाँगीर ) का झुकाव अनारकली की तरफ बहुत ज्यादा बढ़ चुका था और वह अपने दिन का अधिकांश भाग अनारकली के साथ बिताना पसंद करता था और इस बात से अकबर चिढ़ता था क्यूंकि वह अपने पुत्र से बहुत स्नेह करता था, परिणामस्वरूप अकबर ने अनारकली को अपने दरबार से बाहर निकलवा दिया और उसे अफगानिस्तान के क्षेत्र की तरफ भारत की सीमा से बाहर भेज देता है और इस तरह से सलीम ( जहाँगीर ) और अनारकली अलग हो जाते हैं।

बाद में जब अनारकली की मृत्यु हो जाती है, तब सलीम ( जहाँगीर ) उसके मकबरे का निर्माण 1615 में लाहौर में करवाता है और इस मकबरे में उसने लिखवाया है की “अगर मुझे एक दिन की मोहलत मिल जाती अनारकली को देखने की तो मैं कयामत के दिन तक अल्लाह का शुक्र गुज़ार होता“, यह उसने उस मकबरे में लिखवाया है जिससे स्पष्ट होता है की जहाँगीर अनारकली से कितना प्रेम करता था।

जहाँगीर का प्रारंभिक शासन

Jahangir early reign in Hindi

प्रारंभिक शासन में जहाँगीर ने अपने करीबी जिन्हें वह पसंद करता था उन्हें अच्छे-अच्छे पद प्रदान किये, जिसमे वीर सिंह बुंदेला भी था जिसकी सहायता से उसने अबुल फज़ल की हत्या करवाई थी, उसे भी एक अच्छा पद दिया।

खुसरो का विद्रोह

Khusrau’s Rebellion in Hindi

इन सब घटनाओ को देखकर उसका पुत्र खुसरो विद्रोही होने लगता है, और जब जहाँगीर शासक बनता है तब खुसरो की आयु लगभग 20-22 वर्ष हो चुकी थी, उसके मन में यह विचार था की अगर उसका पिता अभी शासक बनता है और लगभग 20 वर्ष भी शासन कर लेता है तो उसे शासन करने का मौका नहीं मिलेगा।

यही कारण था की खुसरो, जहाँगीर के राजा बनने के एक वर्ष बाद ही 1606 में विद्रोह कर देता है, उसके विद्रोही स्वभाव को देखते हुए जहाँगीर उसे नज़रबंद कर देता है, परंतु वह फिर भी भाग निकलता है ।

खुसरो आगरा के किले से भाग कर तरनतारन नामक स्थान पर पांचवें सिक्ख गुरू अर्जुन सिंह सिख गुरु अर्जुन देव के पास जाता है, उनका आशीर्वाद लेता है और जहाँगीर के खिलाफ रणनीति बनाने लगता है।

जहाँगीर की सेना उसका पीछा करती है और भैरावल के मैदान में खुसरो और जहाँगीर का संघर्ष होता है, इसमें खुसरो पराजित हो जाता है और खुसरो को लाकर नज़रबंद करके कैद में रख दिया जाता है।

जहाँगीर, पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव से काफी नाराज़ था क्यूंकि उन्होंने उसके विद्रोही खुसरो को आशीर्वाद दिया था, जहाँगीर ने पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव से कहा की या तो आप जुर्माने का भुगतान करिए नहीं तो आपको सजा दी जाएगी।

जुर्माने की रकम भरने से गुरु अर्जुन देव ने इंकार कर दिया, परिणामस्वरूप उनको फांसी की सज़ा दे दी गई। जिस कारण से 1622 ई. में खुर्रम ने खुसरो की  हत्या करा दी जहाँगीर ने सिक्ख गुरू अर्जुन सिंह(Arjun singh) को मरवा डाला, जिससे सिक्खों व मुगलों में कटुता उत्पन्न हो गई

एक वर्ष के बाद फिर खुसरो उस कैद से निकल जाता है और फिर से वह 1607 में जहाँगीर की हत्या की रणनीति बनाता है, इस बात से जहाँगीर काफी दुखी होता है और इस बार वह कठोर दंड देते हुए खुसरो की दोनों आखें निकलवा लेता है, और इस प्रकार उसे अँधा करके कैद में डाल दिया जाता है और वह कैद में ही लंबे समय तक रहता है।

बाद में शाहजहाँ ( खुर्रम ) को ऐसा लगता है की क्योंकि खुसरो उसका बड़ा भाई है, तो जब जहाँगीर की मृत्यु होगी तब खुसरो राजा बनने की चेष्टा करेगा, इसलिए शाहजहाँ ( खुर्रम ) कुछ कैदियों की ही सहायता लेता है और कैद में ही गला घोंट कर उसकी हत्या करवा देता है और इस प्रकार 1621 में शाहजहाँ ( खुर्रम ) के कहने पर कैद में खुसरो की हत्या कर दी जाती है।

महाबत खां का विद्रोह ( 1626 )

Revolt of Mahabat Khan in Hindi

बाद में सेनापति महाबत खां की भी इच्छाएं बढ़ने लगती है क्यूंकि वो देखता है की नूरजहां के गुट का प्रभाव राजा पे ज्यादा है, इसलिए उसने 1626 में विद्रोह किया, लेकिन इसके विद्रोह को भी दबा दिया जाता है।

बाद में जहाँगीर की 1627 में मृत्यु होने के बाद खुर्रम ( शाहजहाँ ) शासक बन जाता है।

इस प्रकार हम यह देख सकते है की खुसरो, खुर्रम, महाबत खां ने जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह किया, परंतु किसी का विद्रोह सफल नहीं हो पाया था, अंत में जहाँगीर की मृत्यु के बाद ही किसी को सत्ता मिल पाती है।

जहाँगीर का दक्षिण विजय

Jahangir’s southern conquest in Hindi

अहमदनगर जो दक्षिण भारत का प्रमुख क्षेत्र था, वहां का वज़ीर बहुत ही ताकतवर और शक्तिशाली माना जाता था जिसका नाम मलिक अम्बर था।

मलिक अम्बर के खिलाफ काफी शुरुआती अभियान मुगलों के द्वारा चलाये गए, परंतु मलिक अम्बर ने हार नहीं मानी बल्कि कई अवसर ऐसे आये जब उसने मुगलों को पराजित कर दिया, लेकिन बाद में अहमदनगर में खुर्रम के नेतृत्व में एक सेना भेजी जाती है जो मलिक अम्बर को पराजित कर देती है, इस प्रकार खुर्रम एक अच्छे शासक के रूप में उभर कर आता है।

इस बात से खुश होकर जहाँगीर ने खुर्रम को “शाहजहाँ” की उपाधि दी।

अभी आपने जहाँगीर के शासन की प्रारंभिक घटनाओं को पढ़ा, अब जहाँगीर के शासन के दौरान की बहुत महत्वपूर्ण घटना को पढ़ते हैं।

जहाँगीर का मेवाड़ विजय

Jahangir’s conquest of Mewar in Hindi

मेवाड़, चित्तौड़ के क्षेत्र को अकबर भी नहीं जीत पाया था। महाराणा प्रताप से अकबर का संघर्ष जरूर हुआ था, परंतु महाराणा प्रताप की मृत्यु तक भी वह पूरे मेवाड़ पर विजय प्राप्त नहीं कर सका था, अकबर केवल चित्तौड़ क्षेत्र पर ही शासन कर रहा था बाकी जो मेवाड़ का क्षेत्र था वह पुनः महाराणा प्रताप के पास चला गया था, हालांकि महाराणा प्रताप की मृत्यु अकबर के ही समय हो जाती है।

महाराणा प्रताप के बाद उनका पुत्र अमर सिंह शासक बनता है, दूसरी तरह मुगल बादशाह के रूप में अकबर के बाद जहाँगीर शासक बनता है, जहाँगीर को भी पता था की मेवाड़ एक बहुत बड़ा क्षेत्र है और बहुत ही ताकतवर क्षेत्र है, इसलिए वह मेवाड़ को दबाने के लिए शुरुवाती दौर में ही सेना को भेजना शुरू कर देता है।

अमर सिंह या तो जहाँगीर के सामने अधीनता स्वीकार कर सकते थे जैसा कई और राजपूत राजाओं द्वारा किया गया था और या तो वे उसी प्रकार से संघर्ष करे जैसे की उनके पिता महाराणा प्रताप ने किया था।

अमर सिंह ने अपने पिता की तरह ही संघर्ष करने का निर्णय लिया और जहाँगीर के साथ संघर्ष किया और संघर्ष करना प्रारंभ किया, शुरुआती संघर्ष में अमर सिंह जहाँगीर की सेना को पराजित भी करते है।

दूसरी ओर, हमने अभी खुसरो के विद्रोह के बारे में पढ़ा था तो उस समय खुसरो के द्वारा शुरू किये गए विद्रोह के कारण जहाँगीर अपनी सेना को मेवाड़ से वापिस बुलाकर खुसरो के खिलाफ लगा देता है।

बाद में 1613 में एक समय ऐसा आता है की जहाँगीर गुस्से में अपने पुत्र खुर्रम (शाहजहाँ) को ही मेवाड़ विजय के लिए भेज देता है, 1613 में जहाँगीर भी अजमेर की यात्रा के लिए गया था और इसी दौरान उसने खुर्रम (शाहजहाँ) को मेवाड़ विजय के लिए भेजा।

खुर्रम ने वहां जाकर बहुत कत्लेआम मचाया, फसलें नष्ट कर दी और किसानों को बहुत प्रताड़ित किया, परिणामस्वरूप अमर सिंह को ऐसा एहसास हुआ की अब उनके पास कोई रास्ता नहीं है और अब संधि कर लेनी चाहिए, अन्ततः अमर सिंह ने खुर्रम के सामने संधि का प्रस्ताव रखा और खुर्रम ( शाहजहाँ ) ने भी यह संधि का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

जहाँगीर का मेवाड़ – मुगल संधि ( 1615 )

Jahangir Mewar – Mughal Treaty in Hindi

अन्ततः 1615 में मेवाड़ और मुगलो के बीच चित्तौड़ की संधि हुई, जिसमे कुछ शर्तें थी और यह संधि अन्य राजपूत संधियों से थोड़ी अलग थी, आइये देखें: –

  1. इसमें उन्होंने माना की वे मुगलों के अधीन हैं।
  2. जैसा की हमने पिछले आर्टिकल में पढ़ा था की कछवाहा राजपूतों ने संधि के क्रम में मुगलों से वैवाहिक संबंध बनाये थे, परंतु मेवाड़ के राजपूतों ने यह निर्णय किया की वे मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध नहीं बनाएंगे, और इस इस संधि के तहत मेवाड़ के राजपूतों और मुगलों के बीच कोई भी वैवाहिक संबंध नहीं बनता है।
  3. अमर सिंह अपने पुत्र करण सिंह को मुगल दरबार यानी जहाँगीर के दरबार में रहने के लिए भेज देते है।
  4. चित्तौड़ का किला जो मुगलों के पास हुआ करता था उसे पुनः अमर सिंह को वापस कर दिया जाता है, अमर सिंह को यह किला इस शर्त पर वापस किया जाता है की वे इस किले की किलाबंदी यानी मरम्मती या उसका घेराव नहीं करवाएंगे।

इस प्रकार यह एक सम्मानजनक संधि थी राजपूतों की दृष्टि से भी और मुगलों के द्वारा भी काफी अच्छा व्यवहार किया गया था इस राजपूत वंश के साथ, इस प्रकार से यह संधि सफल होती है, परंतु सफल संधि के बीच मेवाड़ का विलय मुगलों के अधीन हो जाता है चित्तौड़ की संधि के तहत।

इस प्रकार यह घटनाएं राजनितिक घटनाओं से जुडी हुई थी, जो जहाँगीर के समय घटित हुई थी।

जहांगीर की आत्मकथा

Autobiography of Jahangir in Hindi

जहांगीर को लिखने का भी बेहद शौक था, जहांगीर द्वारा शुरू की गई किताब “तुजुक-ए-जहांगीर” (Tuzk-e-Jahangiri) नाम की आत्मकथा को मौतबिंद खान द्धारा पूरा किया गया। इस तरह जहांगीर ने अपनी पूरी जिंदगी ऐश-ओ-आराम से जी।

वहीं शराब की बुरी लत ने उसके शरीर को बर्बाद कर दिया था। हालांकि, जहांगीर ने अपने जीवन में कुछ महत्वपूर्ण लड़ाई तो नहीं लड़ी, लेकिन अपने पिता अकबर द्दारा रखी गई मुगल साम्राज्य की मजबूत नींव को कमजोर भी नहीं पड़ने दिया। जहांगीर को उसकी उदारता, दरियादिली के लिए जाना जाता है।

चित्रकला का गूढ़ प्रेमी जहांगीर

Jahangir a lover of painting in Hindi

मुगल सम्राट जहांगीर चित्रकला का बेहद शौकीन था, वे अपने महल में कई अलग-अलग तरह के चित्र इकट्ठे करते रहते थे उसने अपने शासनकाल में चित्रकला को काफी बढ़ावा भी दिया था। यही नहीं जहांगीर खुद के एक बेहतरीन आर्टिस्ट थे। मनोहर और मंसूर बिशनदास जहांगीर के शासनकाल के समय के मशहूर चित्रकार थे।

जहांगीर के शासनकाल को चित्रकला का स्वर्णकाल भी कहा जाता है। वहीं मुगल सम्राट ने जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है कि “कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या फिर जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मैं देखते ही तुरंत बता सकता हुँ कि यह किस चित्रकार की कृति है।”

जहाँगीर के काल को चित्रकला का स्वर्णयुग कहा जाता है, और उसने अपनी आत्मकथा तुजुक-ऐ-जहाँगीरी में भी लिखा है की अगर वह किसी चित्र को देखे जिसे बहुत सारे चित्रकारों ने बनाया हो, तो वह यह तक बता सकता है की चित्र का कौनसा भाग किस चित्रकार ने बनाया है और वह अपने आप को चित्रकला का बहुत बड़ा पारखी मानता था।

जहाँगीर के समय में महत्वपूर्ण चित्रकार थे मंसूर, जिसको उसने “नादिर-उल-अस्त्र” नामक उपाधि दी थी, मंसूर एक पक्षी विशेषज्ञ था और पक्षियों के चित्र बनाने के लिए वह बहुत ज्यादा लोकप्रिय था।

इसके अलावा अबुल हसन यह भी एक महत्वपूर्ण चित्रकार थे जो जहाँगीर के दरबार में रहते थे, और इसको जहाँगीर ने “नादिर-उल-जमा” की उपाधि दी थी और वह किसी व्यक्ति विशेष के चित्र बनाने के लिए लोकप्रिय था।

जहांगीर का स्थापत्य कला प्रेम

Jahangir’s love of architecture in Hindi

नूरजहां ने अपने पिता मिर्ज़ा गियास बेग, जिनको जहाँगीर ने “इत्माद-उद-दौलाह” की उपाधि दी थी, उनकी मृत्यु के बाद नूरजहां ने आगरा में एक मकबरे का निर्माण करवाया जिसे “इत्माद-उद-दौलाह का मकबरा” कहा जाता है।

यह मकबरा पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर से निर्मित है और यह भारत में बनने वाला पहला पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर से बनने वाला मकबरा है, बाद में चल कर शाहजहाँ ने विशाल पूर्णतः सफेद संगमरमर से बना मकबरा जिसे ताजमहल कहते है, वह बनवाया था अन्यथा पहले यही इत्माद-उद-दौलाह का मकबरा पूर्णतः सफ़ेद संगमरमर से बना था जो की नूरजहां ने बनवाया था।

इस मकबरे में पित्रादुरा का काम किया गया था, पित्रादुरा एक नकाशीगिरी होती है जिसमे छोटे-छोटे ज़री के काम दीवारों में होते है और इसे पित्रादुरा पद्ति कहा जाता है, इस पद्ति का भी सबसे पहला प्रयोग इत्माद-उद-दौलाह के मकबरे में ही हुआ था।

इसके अलावा जब जहाँगीर की 1627 में मृत्यु होती है, तब उसका मकबरा शाहदरा, लाहौर में बनवाया जाता है जो की पाकिस्तान में स्थित है।

जहांगीर का साहित्य प्रेम

Jahangir’s love of literature in Hindi

जहाँगीर एक उच्च कोटि का लेखक था, और अपने पिता के समान नहीं था जैसा की हमने पढ़ा था की अकबर पढ़ा-लिखा नहीं था।

उसने अपनी आत्मकथा लिखी जिसका नाम “तुजुक-ऐ-जहाँगीरी” था और यह आत्मकथा उसने फ़ारसी भाषा में लिखी थी।

जहाँगीर की आत्मकथा में मूल रूप से तीन अध्याय हैं, प्रथम में उसके प्रारंभिक जीवन के बारे में, दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण भाग है वह जहाँगीर ने खुद लिखा है और अपने बारे में काफी विस्तृत जानकारी दी है, परंतु जब उसकी मृत्यु हो जाती है तब उसमे तीसरा अध्याय जोड़ा जाता है जिसमे उसकी मृत्यु के बाद की घटनाओं को लिखा जाता है जिसे मुहम्मद हादी के द्वारा पूरा किया जाता है।

इसके अलावा जहाँगीर ने एक सैन्य सुधार किया था, उसने दो अस्पा एवं सिंह अस्पा नामक प्रथा चलाई थी।

जैसे की हमने पढ़ा था की अकबर द्वारा मनसबदारी व्यवस्था चलाई जाती है, जिसमे पद होते थे और उस पद के अनुसार उसको सेना या घोड़े रखने की अनुमति होती थी और उसकी सीमा निर्धारित की गयी थी।

जहाँगीर उसी मनसबदारी व्यवस्था में थोड़ा बदलाव लाया और उसका नाम रखा दो अस्पा एवं सिंह अस्पा।

जैसे कोई सवार का पद है और उसे 1000 घोड़े रखने की अनुमति दी गयी है लेकिन उसे दो गुना कर दिया जाए और पद वही रहे और उसे दो गुने घोड़े रखने होंगे तो उसे दो अस्पा कहा जाता था और इसी में अगर इसे तीन गुना कर दिया जाए तो उसे सिंह अस्पा कहा जाता था। यह सेना से संबंधित सुधार था जिसे जहाँगीर के समय में किया गया था।

जहांगीर से जुड़े रोचक तथ्य

Interesting facts about Jahangir in Hindi

तो चलिए अब जहांगीर से जुड़े रोचक तथ्य (Interesting facts about Jahangir in Hindi) को जानते है :-

  • जहांगीर की मुख्य सफलता मेवाड पर विजय थी
  • नूरजहाँ की माता अस्मत बेगम नूरजहाँ की मुख्य परामर्शदात्री थी तथा इत्र की आविष्कारक मानी जाती है
  • जहांगीर के काल में सबसे पहले पुर्तगाली आये थे
  • जहांगीर मध्ययुगीन शासकों में अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिध्द था
  • जहाँगीर का जन्म 30 अगस्त, 1569 को हुआ था।
  • अकबर द्वारा जहाँगीर का नाम सूफी संत शेख सलीम चिश्ती से प्रेरित होकर रखा।
  • जहाँगीर की माता मारियम जमानी अम्बर के राजा. भारमल की पुत्री थी।
  • सलीम (जहाँगीर) की 18 फरवरी, 1585 ई० में अम्बर के राजा भगवान दास की पुत्री मानबाई से शादी हुई।
  • सलीम ने मानबाई को शाह बेगम की उपाधि प्रदान की।
  • 1586 ई० में सलीम ने उदय सिंह की पुत्री जगत गोसाईं से विवाह किया जिससे शहजादा खुर्रम का जन्म हुआ।
  • सलीम ने 1599 ई० से 1603 ई० तक अपने पिता सम्राट अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया।
  • आगरा के किले के शाहबुर्ज एवं यमुना तट पर एक खंभे में सोने की जंजीर लगी हुई थी जो जहाँगीर की न्याय की जंजीर कहलाती थी।
  • जहाँगीर ने 1606 ई० में अपने सबसे बड़े पुत्र खुसरो के विद्रोह को दबा दिया एवं उसे कैद में डाल दिया।
  • जहाँगीर द्वारा सिखों के ‘5वें’ गुरु अर्जुनदेव को विद्रोही राजकुमार खुसरो को सहायता देने के कारण मृत्युदंड दिया गया,
  • शाहजादा खुर्रम द्वारा अहमदनगर के वजीर मलिक अंबर का दमन करने के कारण जहाँगीर ने उसे शाहजहाँ की उपाधि से नवाजा।
  • 1611 ई० में जहाँगीर ने ईरान निवासी मिर्जा ग्यासबेग की पुत्री मेहरुनिस्सा से विवाह किया।
  • विवाह के पश्चात जहाँगीर ने मेहरूनिस्सा को नूरजहाँ (Light of the world) एवं उसके पिता ग्यासबेग को एतमाद-उद्-दौला की उपाधि से नवाजा।
  • जहाँगीर ने 1613 ई० में नूरजहाँ को बादशाह बेगम के पद पर नियुक्त किया।
  • जहाँगीर ने मिर्जा ग्यास बेग को शाही दीवान के पद पर नियुक्त किया।
  • 1622 ई० में शाह अब्बास (ईरान का शासक) ने कंधार मुगलों से छीनकर अपने अधिकार में कर लिया।
  • नूरजहाँ ने 1611 ई० से 1627 ई० तक के जहाँगीर के प्रशासन को एक हद तक अपने हाथों में ले लिया था। जहाँगीर के खुर्रम, खुसरो, परवेज, शहरयार एवं जहाँदार नामक 5 पुत्र थे।
  • जहाँगीर के शासनकाल में अस्मत बेगम (नूरजहाँ की माता) ने गुलाब से इत्र बनाने की कला विकसित की।
  • जहाँगीर के काल का प्रमुख निर्माण 1626 ई० में नूरजहाँ द्वारा बनवाया गया एतमाद-उद्-दौला का मकबरा है।
  • एतमाद-उद्-दौला का मकबरा ऐसी प्रथम इमारत है जो पूर्णतः श्वेत संगमरमर से निर्मित है।
  • भीमवार नामक स्थान पर जहाँगीर की मृत्यु 7 नवंबर 1627 ई० को हुई।
  • जहाँगीर का शासनकाल मुगल चित्रकारी का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • जहाँगीर के दरबार में आगारजा, अबुल हसन, मुहम्मद नासिर, मुहम्मद मुराद, उस्ताद मंसूर, विशनदास, मनोहर एवं गोवर्धन, फारूख बेग एवं दौलत आदि चित्रकार थे।
  • जहाँगीर ने आगरा में एक चित्रशाला स्थापित की।
  • नूरजहाँ ने ही जहाँगीर के मकबरे (शाहदरा-लाहौर) का निर्माण करवाया।
  • नूरजहाँ द्वारा जहाँगीर के एक अन्य पुत्र शहश्यार को जहाँगीर के उत्तराधिकारी के रूप में समर्थन देने के कारण खुर्रम ने सम्राट के खिलाफ 1622-25 ई० की अवधि में विद्रोह कर दिया।
  • खुर्रम के विद्रोह को महावत खाँ ने दबाया।
  • जहाँगीर के शासनकाल में महावत खाँ ने 1626 ई० में विद्रोह कर दिया।
  • जहाँगीर कालीन निर्मित फारसी भाषा के ऐतिहासिक ग्रंथों में तुजूक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीर), इकबालनामा-ए-जहाँगीरी (मौतमिद् खाँ), मुहासिर-ए-जहाँगीरि (ख्वाजा कामगार), मजखान-ए-अफगाना (नियामतुल्ला) एवं तारीख-ए-फरिश्ता (मुहम्मद कासिम फरिश्ता) आदि प्रमुख हैं।
  •  जहाँगीर के दरबार में 1615 ई० से 1618 ई० तक व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने के उद्देश्य से विलियम हॉकिंस, पालिकेनि, सर टॉमस रो एवं टेरी इंगलैंड के राजा के दूत के रूप में भारत आये। जहाँगीर विलियम हॉकिंस को इंगलिश खान कहता था।
  • सिकंदरा में अकबर के मकबरे का निर्माण उसी की योजना के अनुसार जहाँगीर ने 1612 में करवाया।
  • जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात 4 फरवरी, 1628 ई० को शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) का राज्याभिषेक आगरा में हुआ।

मुगल सम्राट जहांगीर की मृत्यु

Death of Mughal Emperor Jahangir in Hindi

साल 1627 में जब मुगल सम्राट जहांगीर कश्मीर से वापस लौट रहा था, तभी रास्ते में लाहौर (पाकिस्तान) में तबीयत बिगड़ने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद, जहांगीर के मृत शरीर को अस्थायी रूप से लाहौर में रावी नदी के किनारे बने बागसर के किले में दफनाया गया था।

फिर बाद में वहां जहांगीर की बेगम नूरजहां द्धारा जहांगीर का भव्य मकबरा बनवाया गया, जो आज भी लाहौर में पर्यटकों के आर्कषण का मुख्य केन्द्र है। वहीं जहांगीर की मौत के बाद उसका बेटा खुर्रम (शाहजहां) मुगल सिंहासन का उत्तराधिकारी बना।

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