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सम्राट अशोक का इतिहास जीवन परिचय कलिंग युद्ध और मृत्यु – History of Samrat Ashok in Hindi

आज के इस पोस्ट मे सम्राट अशोक का जीवन परिचय इतिहास History of Samrat Ashok in Hindi के बारे मे जानेगे। इतिहास में कुछ लोग हमेशा याद किए जाते हैं, जब भी बात भारतीय इतिहास में वीर योद्धाओ और शासको का नाम आता है, तो उनमे सम्राट अशोक का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिसकी तुलना विश्व में किसी से नहीं की जा सकती। वह भारत में मौर्य साम्राज्य के तीसरे शासक थे जिन्होंने 269 ईसापूर्व से 232 ईसापूर्व तक भारत के लगभग सभी महाद्वीपों पर शासन किया था। तो चलिये यहा सम्राट अशोक का इतिहास जीवन परिचय युद्ध और मृत्यु History of Samrat Ashok in Hindi Biography Jeevan Parichay Date Of Birth, Birth Place, Father, Mother, Wife Children, Kaling Fight, Death जानेगे.

चक्रवर्ती सम्राट अशोक का जीवन परिचय इतिहास कलिंग युद्ध और मृत्यु

History of Samrat Ashok in Hindi

History of Samrat Ashok in Hindiप्राचीन काल में एक वंश बहुत ही लोकप्रिय हुआ जिसके बारे में आज भी सभी लोग पढ़ते है।  उस वंश में एक से बढ़कर एक शूरवीर, शक्तिशाली और विश्वप्रसिद्ध राजा हुए थे उसी वंश से एक राजा सम्राट अशोक भी हुए जिन्हें लोग उनके कार्यो और अखंड भारत पर शासन के लिए जनता है। अशोक मौर्य वंश के तीसरे शासक थे कहा जाता है की अशोक एक धार्मिक सहिष्णु और बौध धर्म के सबसे बड़े अनुयायी भी थे।

चक्रवर्ती सम्राट अशोक (Samrat Ashok) को मौर्य वंश के सभी राज्यों में से महान माना जाता है। सम्राट अशोक की महानता के पीछे इनके द्वारा देश और समाज के लिए किए गए कार्य और भारत के सबसे विशाल साम्राज्य का सफलतापूर्वक शासन करना रहा है।

अशोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है सम्राटों का सम्राट और यह उपाधि सम्राट अशोक को दिया गया था अशोक के अलावा यह उपाधि भारत के अन्य किसी भी शासक को नही दिया गया है। यह उपाधि ही अशोक के महानता को दिखाने के लिए काफी है।

सम्राट अशोक को उनके अदभुत साहस, पराक्रम, निडरता और निर्भीकता की वजह  से अशोक महान के नाम से पुकारा जाता था। इसके अलावा उन्हें प्रियदर्शी एवं देवानाम्प्रिय आदि नामों भी संबोधित किया जाता था। सम्राट अशोक एक ऐसे शासक थे, जिन्होंने अपने शासनकाल में अपनी कुशल कूटनीति का इस्तेमाल कर मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया था।

अशोक के शासन काल में मौर्य वंश की सीमा पूर्व में बांग्लादेश एवं पाटलिपुत्र से लेकर पश्चिम में ईरान और बलूचिस्तान था इतना ही नही मौर्य साम्राज्य का शासन उत्तर में हिन्दुकुश एवं तक्षशिला से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी एवं मैसूर तक फैला था। इन सभी जगहों को आज के वर्तमान समय से तुलना किया जाये तो यह पुरे भारत, नेपाल, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और भूटान सभी देशो पर मौर्य राज्यवंश का शासन था जिसे अखंड भारत के रूप में जाना जाता था।

कलिंग पर अपनी विजय के बाद उन्होंने जब उनके और उनकी सेना द्वारा नरसंहार देखा तो अपना सर पकड़ लिया की क्योकि उनकी एक जीत ने कितने मासूम लोगो के घर ,परिवार तबाह कर दिए थे। ये नज़ारा देखने के बाद सम्राट अशोक ने जीवन भर के लिए हिंसा को त्याग कर बौद्ध धर्म को अपना कर हमेशा के लिए युद्द को त्याग दिया था और भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने में लोगो की मदद की।

सम्राट अशोक बौद्ध धर्म से अत्याधिक प्रभावित थे, उन्होंने बौद्ध धर्म के विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए काफी प्रयास किए। इसके अलावा उन्होंने बौद्ध धर्म का  पूरी दुनिया में जमकर प्रचार-प्रसार भी किया था। इसलिए, उनकी ख्याति बौद्ध धर्म के प्रचारक के रूप में भी फैल गई थी।

यही नहीं उन्होंने नेपाल में महात्मा बुद्ध के जन्मस्थल लुम्बिनी में स्मारक के रुप में अशोक स्तंभ का निर्माण भी  करवाया था, वहीं सम्राट अशोक को महान अशोक बनाने में आचार्य चाणक्य ने प्रमुख भूमिका निभाई है। तो चलिए सम्राट अशोक का इतिहास, जीवन परिचय आदि के बारे भी विस्तार से जानते है।

सम्राट अशोक का जीवन परिचय

Samrat Ashok Biography in Hindi

सम्राट अशोक का जीवन परिचय
नाम :- सम्राट अशोक
अन्य नाम :– देवनांप्रियं, प्रियदर्शी, मगध का राजा, अशोक मौर्य, अशोकवर्धन और अशोक महान।
जन्म :- 304 ईसा पूर्व
जन्म स्थान :- पाटलिपुत्र , वर्तमान पटना (बिहार)
पिता का नाम :- बिन्दुसार
माता का नाम :- सुभद्रांगी (धर्मा)
पत्नी का नाम :- देवी, कारूवाकी, असंधिमित्रा,पद्मावती, तिष्यरक्षित
संतान का नाम :- महेंद्र, संघमित्रा, कुणाल, चारुमती, तीवल
वंश का नाम :- मौर्य वंश
उपाधि :- प्रियदर्शी, चक्रवर्ती सम्राट
राज्याभिषेक :- 270 ईसा पूर्व
मृत्यु :- 232 ईसा पूर्व
समाधि :- पाटलिपुत्र, वर्तमान पटना

सम्राट अशोक का जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

Birth and Early life of Samrat Ashok in Hindi

इतिहास के सबसे शक्तिशाली और ताकतवार योद्धाओं में से एक सम्राट अशोक करीब 304 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के पोते के रूप में बिहार के पाटिलपुत्र में जन्में थे। हालांकि इनके जन्म की तारीख के बारे में कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। सम्राट अशोक मौर्य सम्राज्य के दूसरे शासक बिन्दुसार और माता सुभद्रांगी के पुत्र थे।

अशोक के पिता की लंका की परंपरा के मुताबिक करीब 16 पटरानियां और 101 पुत्र थे। वहीं उनके 100 पुत्रों में से केवल अशोक, तिष्य और सुशीम का ही उल्लेख इतिहास के पन्नों में मिलता है। सम्राट अशोक का पूरा नाम देवानाम्प्रिय’ अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय) था।

अशोक को मौर्य वंश के सबसे शक्तिशाली के रूप में भी जाना जाता है वे मौर्य वंश के तीसरे शासक और चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र थे। अशोक अपने बचपन से ही बहुत प्रखर बुधि और युद्ध कला में निपुण था यही कारण था की अशोक ने अखंड भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित किया था।

अशोक एक महान शासक के साथ साथ एक ज्ञानी व्यक्ति भी थे अशोक को अर्थशास्त्र, गणित, सैन्य योजना आदि चीजो का अधिक ज्ञान था। उन्होंने ने शिक्षा के प्रचार प्रसार के कई कॉलेज और स्कूल का निर्माण करवाया था जिससे लोगो को भी इनके बारे में जानकारी मिल सके।

वे मौर्य साम्राज्य के तीसरा निडर और निर्भीक राजा माना जाते थे। वहीं ऐसा माना जाता हैं की सम्राट अशोक को एक कुशल और महान सम्राट बनाने में आचार्य चाणक्य का बहुत बड़ा योगदान रहा है, आचार्य चाणक्य ने उनके अंदर एक महान शासक के सारे गुण विकसित किए गए थे।

अशोक की माता क्षत्रिये कूल की नही थी जिसके कारण धर्मा को ज्यादातर राजपरिवार में विशेष दर्जा नही जिसका असर अशोक के जीवन पर भी दिखता था और उन्हें भी आरंभिक जीवन में कोई विशेष अधिकार नही था परंतु अशोक ने कुछ ही समय में अपने बुधि और विवेक के चलते एक बहुत ही अहम् मुकाम को पा लिया था जिसके चलते उन्हें लोग पसंद करने लग गये थे।

सम्राट अशोक का बचपन

Samrat Ashoka Childhood Story in Hindi

राजवंश परिवार में पैदा हुए सम्राट अशोक बचपन से ही बेहद प्रतिभावान और तीव्र बुद्धि के बालक थे। शुरु से ही उनके अंदर युद्ध और सैन्य कौशल के गुण दिखाई देने लगे थे, उनके इस गुण को निखारने के लिए उन्हें शाही प्रशिक्षण भी दिया गया था। इसके साथ ही सम्राट अशोक तीरंदाजी में ही शुरु से ही कुशल थे, इसलिए वे एक उच्च श्रेणी के शिकारी भी कहलाते थे।

सम्राट अशोक को बचपन से ही शिकार करने का शौक था और खेलते-खेलते उसमें निपुण हो गए थे। जब वे बड़े हुए तो उन्होंने साम्राज्य के मामलों में अपने पिता की मदद करना शुरू कर दिया और जब भी वे कोई काम करते थे, तो वे अपनी प्रजा का पूरा ध्यान रखते थे इसलिए उनकी प्रजा उन्हें पसंद करने लगी थी।

भारतीय इतिहास के इस महान योद्धा के अंदर लकड़ी की एक छड़ी से ही एक शेर को मारने की अद्भुत क्षमता थी। सम्राट अशोक एक जिंदादिल शिकारी और साहसी योद्धा भी थे। उनके इसी गुणों के कारण उन्हें उस समय मौर्य साम्राज्य के अवन्ती में हो रहे दंगो को रोकने के लिये भेजा गया था।

सम्राट अशोक की विलक्षण प्रतिभा की वजह से ही वे बेहद कम उम्र में ही अपने पिता के राजकाज को संभालने लगे थे। वे अपनी प्रजा का भी बेहद ख्याल रखते थे। इसी वजह से वे अपने प्रजा के चहेते शासक भी थे। वहीं सम्राट अशोक की विलक्षण प्रतिभा और अच्छे सैन्य गुणों की वजह से उनके पिता बिन्दुसार भी उनसे बेहद प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने सम्राट अशोक को बेहद कम उम्र में ही मौर्य वंश की राजगद्दी सौंप दी थी।

सम्राट अशोक की शिक्षा

Samrat Ashoka Education in Hindi

सम्राट अशोक जन्म से ही एक महान शासक थे, उसके साथ ही वे ज्ञानी और महान शक्तिशाली शासक भी थे. महान सम्राट अशोक अर्थशास्त्र और गणित के महान ज्ञाता थे. सम्राट अशोक ने शिक्षा के प्रचार के लिए कई स्कूल और कॉलेज की स्थापना भी की थी.

सम्राट अशोक ने 284 ई.पू बिहार में एक उज्जैन अध्ययन केंद्र की स्थापना की थी. इतना ही नहीं इन सबके अलावा भी उन्होंने कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना की थी. सम्राट स्वयं शिक्षा के क्षेत्र में भी कई महान कार्य किये थे जिनकी वजह से उन्हें एक महान शासक के नाम से जाने जाते है.

सम्राट अशोक पर भविष्यवाणी

Prophecy on Emperor Ashoka in Hindi

जब सम्राट अशोक का जन्म हुआ था तो उसने अपनी माता सुभद्रांगी को बहुत कम कष्ट दिया था जिससे माता सुभद्रांगी ने उसका नाम अशोक रखा।

अशोक की त्वचा व दिखावट भद्दी थी जिसके कारण पिता बिंदुसार ने उसे कभी पसंद नहीं किया। एक दिन, भावी राजा को जानने के लिए बिंदुसार ने पिंगलवत्स-जीव नाम के एक ज्योतिष को बुलाया। सभी 101 राजकुमारों को एक बगीचे में बुलाया गया। परंतु, अशोक जाना नहीं चाहता था क्योंकि उसके पिता उसे पसंद नहीं करते थे तो उसकी माता ने उसे वहां जाने के लिए कहा।

तपस्वी पिंगलवत्स-जीव को आभास हुआ कि आने वाले समय में राजकुमार अशोक ही मौर्य साम्राज्य का सम्राट बनेगा। परंतु, उन्होंने कुछ स्पष्ट जवाब नहीं दिया और एक इशारा करते हुए कहा कि जिस राजकुमार के पास अच्छा घोड़ा, गद्दी, पेय, पात्र और भोजन होगा वह राजा बनेगा।

सभा समाप्त हो जाने के बाद तपस्वी ने सुभद्रांगी को बताया कि अशोक ही राजा बनेगा। इस खबर का पता चलते ही सुभद्रांगी ने तपस्वी को जल्द से जल्द महल छोड़ने के लिए कहा क्योंकि बिंदुसार अस्पष्ट जवाब से क्रोधित हो सकता था।

सम्राट अशोक की पत्नि

Emperor Ashoka wife in Hindi

सम्राट अशोक ने पांच विवाह किए थे, सम्राट अशोक की पांचों पत्नियों के नाम महादेवी, तिष्यरक्षिता, देवी, कारुवाकी, पद्मावती थे। अशोक की अंतिम पत्नी कौर्वकी थी, जिससे अशोक ने प्रेम विवाह रचाया था, इसके अलावा अशोक ने विदिशा महादेवी साक्याकुमारी से शादी की थी। एक बार जब सम्राट अशोक ईलाज करवाने उज्जैन गए हुए थे उस वक्त अशोक की मुलाकात विदिशा की राजकुमारी महादेवी से हो गई, बाद में अशोक ने महादेवी साक्याकुमारी विवाह कर लिया था.

रानी असंधिमित्रा सम्राट अशोक की सबसे प्रिय रानी थी। वह असंधिमित्रा से बहुत प्रभावित हुआ और उसको 7 दिन के लिए शासन संभालने को भी कहा। परंतु, असंधिमित्रा ने इंकार कर दिया। उसने अपनी अन्य 16,000 महिलाओं में हमेशा ही रानी असंधिमित्रा को सबसे ऊपर रखा।

असंधिमित्रा ने ही उसे 84,000 स्तूप और विहार बनाने के लिए उत्साहित किया था। अशोक के राजा बनने के बाद से ही असंधिमित्रा ही मौर्य साम्राज्य की महारानी थी। जब असंधिमित्रा की मृत्यु हो गई तो अशोक ने तिश्यारक्षिता को महारानी बनाया।

सम्राट अशोक के संतान

Samrat Ashok Children in Hindi

सम्राट अशोक के पुत्र का नाम महेंद्र, कुणाल और तीवल था जबकि पुत्री का नाम संघमित्रा और चारुमती था,

तीवल करूवाकी का पुत्र था, कुणाल- पद्मावती का पुत्र था, पुत्र महेंद्र पुत्री संघमित्रा और चारूमती देवी के पुत्र पुत्रियां थी.

सम्राट अशोक का राज्याभिषेक

Coronation of Emperor Ashoka in Hindi

चक्रवर्ती सम्राट अशोक के पिता राजा बिंदुसार 273 ईसा पूर्व में बीमार पड़ गए। जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा बड़े बेटे के कहने पर राजा बिंदुसार ने अशोक को कलिंग भेज दिया था। लेकिन उज्जैन में हुए विद्रोह को दबाने के लिए पुनः सम्राट अशोक को आना पड़ा। जब इनके पिता बीमार पड़े तब चक्रवर्ती सम्राट अशोक उज्जैन में गवर्नर के रूप में काम कर रहा था।

सुसिम, बिंदुसार का सबसे प्रिय और ज्येष्ठ पुत्र था जिसने प्रधानमंत्री का भरी सभा में सिर पर थप्पड़ मार कर अपमान किया था। इस रूखे व्यवहार से, प्रधानमंत्री ने सुसिम को एक अयोग्य राजा मान लिया था और अशोक को राजा बनाने के लिए उन्होंने 500 मंत्रियों का एक समूह बनाया।

जब अशोक उज्जैन का वायसराय था तब एक बार फिर तक्षशिला में विद्रोह पनप उठा था। जिसे दबाने के लिए बिंदुसार ने ना चाहते हुए अपने प्रिय पुत्र सुसिम को भेजा। उसके जाने के बाद बिंदुसार का स्वास्थ्य कमजोर हो गया। इसी समय में अशोक उज्जैन से पाटलिपुत्र आ गया। बिंदुसार सुसिम को राजा बनाना चाहता था तो अपनी स्थिति को देखते हुए उसने अशोक को तक्षशिला जाने और सुसिम को वापस बुलाने के लिए कहा।

मंत्रियों ने बताया कि अशोक भी बीमार पड़ गया है तो वह तक्षशिला नहीं जा पाएगा। सुसिम की अनुपस्थिति में मंत्रियों ने अशोक को सम्राट बनाने का प्रस्ताव रखा परंतु बिंदुसार ने मना कर दिया।

बिंदुसार का स्वास्थ्य और खराब हो गया था और कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद, अशोक ने अपने अन्य भाइयों का कत्ल कर दिया और खुद को मौर्य साम्राज्य का सम्राट घोषित कर दिया। हालांकि, सुसिम को जब यह बात पता चली तो वे पाटलिपुत्र की ओर रवाना हुआ। परंतु, उसे रास्ते में ही प्रधानमंत्री राधागुप्त ने मरवा दिया।

इस तरह, अशोक ने अपने सगे भाई विताशोका को छोड़कर अन्य 99 भाइयों का कत्ल करके मौर्य साम्राज्य के शासन पर अधिकार कर लिया।

लेकिन महावंश एवं दीपवंश नामक साहित्यिक स्त्रोत ओं से ज्ञात होता है कि सम्राट अशोक को राजा बनने से पहले 99 भाइयों की हत्या करनी पड़ी, यह बात एकदम आधारहीन एवं काल्पनिक प्रतीत होती है क्योंकि बाद में अशोक के राज्याभिषेक के समय के उल्लेखित अभिलेखों में उसके भाइयों का उल्लेख मिलता है।

सम्राट अशोक का शासनकाल

Samrat Ashoka reign in Hindi

उस समय तक्षशिला में यूनानी और भारतीय लोगों की जनसंख्या ज्यादा थी। सम्राट अशोक के बड़े भाई सुसीम उस समय तक्षशिला का प्रांतपाल था। सुसीम प्रशासनिक कार्यों में कुशल नहीं था। साथ ही अलग-अलग धर्मों के लोग रहने की वजह से वहां पर एक बहुत बड़ा विद्रोह खड़ा हो गया।

जब अशोक के बडे़ भाई सुशीम अवन्ती की राजधानी उज्जैन के प्रांतपाल थे, उसी दौरान अवन्ती में हो रहे विद्रोह में भारतीय और यूनानी मूल के लोगों के बीच दंगा भड़क उठा, जिसको देखते हुए राजा बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा, जिसके बाद अशोक ने अपनी कुशल रणनीति अपनाते हुए इस विद्रोह को शांत किया।

जिससे प्रभावित होकर राजा बिन्दुसार ने सम्राट अशोक को मौर्य वंश का शासक नियुक्त कर दिया गया। अवन्ती में हो रहे विद्रोह को दबाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद सम्राट अशोक को अवंती प्रांत के वायसराय के रुप में भी नियुक्त किया गया था। वहीं इस दौरान उनकी छवि एक कुशल राजनीतिज्ञ योद्धा के रुप में भी बन गई थी।

इसके बाद करीब 272 ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के पिता बिंदुसार की मौत हो गई। वहीं इसके बाद सम्राट अशोक के राजा बनाए जाने को लेकर सम्राट अशोक और उनके सौतेले भाईयों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इसी दौरान सम्राट अशोक की शादी विदिशा की बेहद सुंदर राजकुमारी शाक्या कुमारी से हुई।

शादी के बाद दोनों को महेन्द्र और संघमित्रा नाम की संतानें भी प्राप्त हुई। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक 268 ईसा पूर्व के दौरान मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए करीब 8 सालों तक युद्ध लड़ा। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ भारत के सभी उपमहाद्धीपों तक मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि भारत और ईरान की सीमा के साथ-साथ अफगानिस्तान के हिन्दूकश में भी मौर्य सम्राज्य का सिक्का चलवाया।

इसके अलावा महान अशोक ने दक्षिण के मैसूर, कर्नाटक और कृष्ण गोदावरी की घाटी में भी कब्जा किया। उनके सम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (मगध, आज का बिहार) और साथ ही उपराजधानी तक्षशिला और उज्जैन भी थी। इस तरह सम्राट अशोक का शासन धीरे-धीरे बढ़ता ही चला गया और उनका सम्राज्य उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय सम्राज्य बना। हालांकि, सम्राट अशोक मौर्य सम्राज्य का विस्तार तमिलनाडू, श्रीलंका और केरल में करने में नाकामयाब हुआ।

सम्राट अशोक का साम्राज्य विस्तार

Expansion of Samrat Ashoka Empire in Hindi

अगर बात अगर अशोक के साम्राज्य विस्तार का करे तो उन्होंने मौर्य वंश को एक नई मुकाम प्रदान किया था। सम्राट अशोक ने चन्द्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य के द्वारा देखि गई अखंड भारत के सपने को बरक़रार रखा था साथ में साम्राज्य का विस्तार और भी अधिक किया था। अशोक के बहादुरी और महानता का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की उसने मात्र 8 वर्षो के अन्दर में असम से लेकर ईरान तक मौर्य साम्राज्य को विस्तृत कर दिया था।

अशोक के शासन काल में मौर्य वंश की सीमा पूर्व में बांग्लादेश एवं पाटलिपुत्र से लेकर पश्चिम में ईरान और बलूचिस्तान था इतना ही नही मौर्य साम्राज्य का शासन उत्तर में हिन्दुकुश एवं तक्षशिला से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी एवं मैसूर तक फैला था। इन सभी जगहों को आज के वर्तमान समय से तुलना किया जाये तो यह पुरे भारत, नेपाल, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और भूटान सभी देशो पर मौर्य राज्यवंश का शासन था।

सम्राट अशोक की प्रशासनिक व्यवस्था

Samrat Ashoka Administrative System in Hindi

अधिकतर शक्तियां चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान के हाथों में थी, लेकिन फिर भी एक व्यवस्थित शासन व्यवस्था लागू करने के लिए उन्होंने ऊपर से लेकर ग्रामीण स्तर तक विभिन्न विभागों के माध्यम से न्याय व्यवस्था एवं शासन व्यवस्था की स्थापना का जाल बिछा रखा था ताकि आम जनता को कम से कम कष्ट सहन करना पड़े। छोटी-छोटी समस्याओं के लिए बार-बार राजा को परेशान नहीं होना पड़े।

चंद्रगुप्त मौर्य और राजा बिंदुसार के समय से चली आ रही मंत्रिपरिषद व्यवस्था चक्रवर्ती सम्राट अशोक के राज्य में भी लागू थी। इस मंत्री परिषद का मुखिया स्वयं चक्रवर्ती सम्राट अशोक थे।

सिर्फ कलिंग क्षेत्र को छोड़कर संपूर्ण साम्राज्य को दिशा के आधार पर चार भागों में बांट रखा था ताकि व्यवस्थित तरीके से शासन किया जा सके। यह भाग उत्तर पूर्वी प्रांत, उत्तर पश्चिमी प्रांत, दक्षिणापथ, अवंती और कलिंग क्षेत्र थे।

सम्राट अशोक के शासन में मुख्य अधिकारी

Chief Officer in Samrat Ashoka Rule in Hindi

सम्राट अशोक के शासन में मुख्य अधिकारी
अग्रमात्य- मुख्य मंत्री या मुख्य सहायक, चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान का अग्रमात्य राधागुप्त था।
महामात्र – सभी विभागों के विभागाध्यक्ष को महामात्र कहा जाता था।
राजुक – राजुक प्रांतीय शासक थे जिन का मुख्य कार्य प्रजा की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना था।
युत्त / युक्त – राजस्व संग्रहण करने वाले अधिकारियों को युत्त / युक्त कहा जाता था।
प्रादेशिक – दीवानी एवं फौजदारी कार्यों की देखभाल करने वाले जिला अधिकारियों को प्रादेशिक कहा जाता था।

सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध

Samrat Ashoka Kalinga War in Hindi

कलिंग का युद्ध अशोक के जीवन का एक बहुत ही अहम् युद्ध माना जाता है इस युद्ध के बाद ही अशोक ने बौध धर्म को अपना लिया था। अशोक के तेरहवें शिलालेख के अनुसार अशोक ने कलिंग के ऊपर 261 ईसा पूर्व में में आक्रमण किया था। उस समय कलिंग का शासक अनंत पद्मनाभन था जिसे युद्ध से पहले अशोक ने एक पत्र के माध्यम से मौर्य वंश के अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा था परन्तु कलिंग नरेश नही माना था जिसके बाद इस युद्ध का आरम्भ हुआ था।

कलिंग का युद्ध एक बहुत ही भयावह युद्ध था इस युद्ध में कलिंग के करीब 1.5 लाख सैनिक मारे गए थे जबकि मौर्य वंश के करीब 1 लाख से अधिक सैनिक मारे गए थे। लाखो लाख की संख्या में सैनिक घायल हुए थे कइयो को बंदी बना लिया गया था। इस दृश्य को देखकर अशोक का ह्रदय द्रवित हो गया था और वह काफी दुखी भी हुआ था अशोक के मन में मानवता के प्रति दया और करुणा का भाव बहने लगा था।

कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने युद्ध को बंद करने का प्रतिज्ञा कर लिया था साथ में अशोक ने कभी शास्त्र नही उठाने का प्राण भी लिया था और इसके बाद धार्मिक प्रचार करना आरम्भ कर दिया था कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने धम्म को अपनाते हुए गौतम बुद्ध द्वारा बनाये गए बौध धर्म के अनुयायी बन गया था।

सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन

Change of heart of Samrat Ashok in Hindi

कलिंग युद्ध के विध्वंशकारी युद्ध में कई सैनिक, महिलाएं और मासूमों बच्चों की मौत एवं रोते-बिलखते घर परिवार देख सम्राट अशोक का ह्रद्य परिवर्तन हो गया। इसके बाद सम्राट अशोक ने सोचा कि यह सब लालच का दुष्परिणाम है साथ ही उन्होंने अपने जीवन में फिर कभी युध्द नहीं लड़ने का संकल्प लिया।

263 ईसा पूर्व में मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक ने धर्म परिवर्तन का मन बना लिया था। उन्होंने बौध्द धर्म अपना लिया एवं ईमानदारी, सच्चाई एवं शांति के पथ पर चलने की सीख ली और वे अहिंसा के पुजारी हो गये।

सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म को अपनाना

Emperor Ashok adoption of Buddhism in Hindi

कलिंग युद्ध के पश्चात सम्राट अशोक का मन इस तरह परिवर्तित हुआ था की उसने बौद्ध धर्म को अपनाते ही शिकार और पशु हत्या तक बाद कर दिया था अशोक ने जनकल्याण के लिए कई धार्मिक स्थल, स्कूल, चिकित्सालय बनवाए, साथ में अशोक के द्वारा बनवाया गया साँची का स्तूप विश्व प्रसिद्ध है।

बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार और भी अच्छे तरीको से हो इसलिए अशोक ने कई लोगो को श्रीलंका, नेपाल, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, यूनान आदि देशो में भेजा साथ में अशोक ने खुद लोगो को इसके बारे में बताया।

बौद्ध धर्म के प्रचार में अशोक के पुत्र महेंद्र को बहुत बड़ा योगदान जाता है महेंद्र ने ही श्रीलंका में इसका प्रचार चरम पर किया था जिसका परिणाम यह हुआ था की वहां के उस समय के राजा ने इसे अपना राजधर्म बना लिया था।

बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में सम्राट अशोक

Samrat Ashok as a propagator of Buddhism in Hindi

बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सम्राट अशोक एक महान शासक एवं एक धर्मपरायण योद्धा के रुप में सामने आए। इसके बाद उन्होंने अपने मौर्य सम्राज्य के सभी लोगों को अहिंसा का मार्ग अपनाने और भलाई कामों को करने की सलाह दी और उन्होंने खुद भी कई लोकहित के काम किए साथ ही उन्हें शिकार और पशु हत्या करना पूरी तरह छोड़ दिया।

ब्राह्मणों को खुलकर दान किया एवं कई गरीबों एवं असहाय की सेवा की। इसके साथ ही जरूरतमंदों के इलाज के लिए अस्पताल खोला, एवं सड़कों का निर्माण करवाया यही नहीं सम्राट अशोक ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर 20 हजार से भी ज्यादा विश्वविद्यालयों की नींव रखी।

ह्रद्यय परिवर्तन के बाद सम्राट अशोक ने सबसे पहले पूरे एशिया में बौध्द धर्म का जोरो-शोरों से प्रचार किया। इसके लिए उन्होंने कई धर्म ग्रंथों का सहारा लिया। इस दौरान सम्राट अशोक ने दक्षिण एशिया एवं मध्य एशिया में भगवान बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए करीब 84 हजार स्तूपों का निर्माण भी कराया।

जिनमें वाराणसी के पास स्थित सारनाथ एवं मध्यप्रदेश का सांची स्तूप काफी मशहूर हैं, जिसमें आज भी भगवान बुद्ध के अवशेषों को देखा जा सकता है। अशोका के अनुसार बुद्ध धर्म सामाजिक और राजनैतिक एकता वाला धर्म था। बुद्ध का प्रचार करने हेतु उन्होंने अपने राज्य में जगह-जगह पर भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमाएं स्थापित की। और बुद्ध धर्म का विकास करते चले गये। बौध्द धर्म को अशोक ने ही विश्व धर्म के रूप में मान्यता दिलाई।

बौध्द धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा तक को भिक्षु-भिक्षुणी के रूप में अशोक ने भारत के बाहर, नेपाल, अफगानिस्तान, मिस्त्र, सीरिया, यूनान, श्रीलंका आदि में भेजा। वहीं बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में सबसे ज्यादा सफलता उनके बेटे महेन्द्र को मिली, महेन्द्र ने श्री लंका के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म के उपदेशों के बारे में बताया, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना दिया।

सार्वजानिक कल्याण के लिये उन्होंने जो कार्य किये वे तो इतिहास में अमर ही हो गये हैं। नैतिकता, उदारता एवं भाईचारे का संदेश देने वाले अशोक ने कई अनुपम भवनों तथा देश के कोने-कोने में स्तंभों एवं शिलालेखों का निर्माण भी कराया जिन पर बौध्द धर्म के संदेश अंकित थे।

महान अशोक की देन अशोक चक्र एवं शेरों की त्रिमूर्ति

Ashoka Chakra and the Trinity of Lions, the gift of the Mahan Ashok in Hindi

भारत का राष्ट्रीय चिह्न ‘अशोक चक्र’ तथा शेरों की ‘त्रिमूर्ति’ भी अशोक महान की ही देंन है। ये कृतियां अशोक निर्मित स्तंभों और स्तूपों पर अंकित हैं। सम्राट अशोक का अशोक चक्र जिसे धर्म चक्र भी कहा जाता है, आज वह हमें भारतीय गणराज्य के तिरंगे के बीच में दिखाई देता है। ‘त्रिमूर्ति’ सारनाथ (वाराणसी) के बौध्द स्तूप के स्तंभों पर निर्मित शिलामूर्तियों की प्रतिकृति है।

सम्राट अशोक के शिलालेख

Emperor Ashok inscriptions in Hindi

सम्राट अशोक ने अपने जीवन काल में कई शिलालेखो का निर्माण करवाया जिसपे उन्होंने मौर्य वंश के बारे जानकारी स्थापित किया है अशोक ने अपने जीवन काल में कई शिलालेखो का निर्माण करवाया जिसमे से कुछ भारत तो कुछ और अन्य देशो में भी है। ये शिलालेख वर्तमान भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, पाकिस्तान में भी है।

इस शिलालेख में कई महत्वपूर्ण जानकारी भी मिलते है यह शिलालेख ही यह बताता है की बौद्ध धर्म कितना प्राचीन है इस शिलालेख से यह भी पता चलता है की बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार भूमध्यसागरीय क्षेत्र तक किया जाता था।

सम्राट अशोक के शिलालेख
पहला शिलालेख– पशुवध निषेध
दूसरा शिलालेख– विदेशों में धम्म प्रचार एवं मनुष्य एवं पशु चिकित्सा का उल्लेख
तीसरा शिलालेख– राज्जुक एवं युक्त की नियुक्ति एवं अधिकारियों को हर पांच वर्षों में राज्य भ्रमण करने का आग्रह
चौथा अभिलेख– धम्मघोष का भेरीघोष के स्थान पर प्रतिपादन
पांचवा अभिलेख– धम्म महापात्रों की नियुक्ति
छठा अभिलेख– इसमें जन मामलों को निपटाने के लिए प्रशासनिक सुधारों का उल्लेख है.
सातवाँ अभिलेख– अशोक सभी धार्मिक मतों के प्रति निष्पक्षता रखेगा.
आठवां अभिलेख– बोधगया की यात्रा का उल्लेख एवं विहार यात्रा के स्थान पर धम्म यात्रा का प्रतिपादन
नवाँ अभिलेख– सच्चे विधानों एवं शिष्टाचार का वर्णन
दसवां अभिलेख– अशोक के उद्यम का लक्ष्य धम्माचरण की श्रेष्ठता घोषित
ग्यारहवां शिलालेख– धम्म के तत्वों का प्रकाशन
बाहरवाँ शिलालेख– धार्मिक सहिष्णुता पर जोर
तेहरवाँ शिलालेख– कलिंग के युद्ध के बाद विजय की घोषणा, विदेशों में धम्म प्रचार
चौदहवां शिलालेख– पहले तेरह शिलालेखों का पुनरवलोकन तथा अशोक के साम्राज्य की महाल के विजिते की संज्ञा.

सम्राट अशोक द्वारा स्तूपों व मंदिरों का निर्माण

Construction of Stupas and Temples by Samrat Ashoka in Hindi

बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने के बाद अशोक ने अपने राज्य में 84,000 स्तूपों व 84,000 विहारों को बनाने का आदेश दिया। हर एक स्तूप  में भगवान गौतम बुद्ध के अवशेषों को सोने, चांदी के बक्सों में रखा गया। इन स्तूपों को उन शहरों में बनवाया गया जिनकी जनसंख्या एक लाख से ज्यादा थी। इन स्तूपों व विहारों के साथ ही उसने बहुत सारे मंदिरों का भी निर्माण करवाया।

सम्राट अशोक के स्तूपों के पास आज भी उसके शिलालेख मिलते हैं जिनके ऊपर उसकी जीवनी व कार्यों का उल्लेख किया गया है।

अशोक के स्तम्भ लेख

Pillar inscriptions of Ashoka in Hindi

ये छः स्थानों से प्राप्त हुए है-

दिल्ली-टोपरा :- यह मूलतः टोपरा (अम्बाला, हरियाणा) में स्थित था और इसे फिरोजशाह तुगलक द्वारा टोपरा से अपनी  नवीन राजधानी फिरोजशाह दिल्ली में स्थापित किया गया.

दिल्ली-मेरठ:- फिरोजशाह तुगलक द्वारा उस अभिकेख को मेरठ से लाकर अपनी नवीन राजधानी में स्थापित किया गया.

प्रयाग :– वर्तमान में यह इलाहबाद के किले में है, पर माना जाता है कि यह मूलतः कौशाम्बी में था इसे रानी अभिलेख कहा जाता था. इसी अभिलेख पर समुद्रगुप्त की प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति है. और इसी स्तम्भ पर जहांगीर द्वारा उत्कीर्ण अभिलेख भी है.

रामपुरवा :– बिहार के चम्पारन जिले में

लौरिया अरराज :- यह उत्तरी बिहार के चम्पारन जिले में है.

सम्राट अशोक के धम्म का प्रचार

Propagation of Samrat Ashoka Dhamma in Hindi

एक बार सम्राट अशोक बोधि वृक्ष की यात्रा पर गया और वहाँ से आने के बाद धम्म का विस्तार करना शुरू किया। अशोक ने सामाजिक कार्यों में लोगों की भलाई के लिए कुछ नियम बनाए थे जिन्हें धम्म (Samrat Ashoka’s Dhamma) कहा जाता है।

मनुष्य और पशुओं के इलाज के लिए औषधियों व अस्पतालों का निर्माण करवाया गया। हर गांव व शहर में पीने के पानी, भोज्य पदार्थों का इंतजाम किया गया। राहगीर को कोई भी परेशानी न हो इसलिए हर सड़क के पास कुओं व आश्रयों का निर्माण किया गया।

उसने संन्यासियों को बड़े स्तर पर भोजन व आवास प्रदान करना शुरू कर दिया। अब बहुत सारे नकली संन्यासी भी असली संन्यासियों के संग में जुड़ने लग गए। असली संन्यासियों ने नकली संन्यासियों के साथ रहने से इनकार कर दिया जिसके कारण 7 वर्षों तक उपोस्थ पर्व आयोजित नहीं किया गया।

एक घटना में नकली संन्यासियों को निकालने के चक्कर में सैनिकों ने कुछ असली संन्यासियों को भी मार दिया। तो सैनिकों ने मोग्गलीपुत्त तिस्सा (Moggaliputta Tissa) को बुलाया और उनसे इस समस्या का निवारण करवाया। जब सब कुछ सही हो गया तो उपोस्थ पर्व भी मनाया जाने लगा।

उसने पाँच-पाँच बौद्ध संन्यासियों के दल को हरेक क्षेत्र में भेजा और बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया। इन दलों में उसके पुत्र-पुत्रियां भी गए थे।

अशोक के धम्म के कुछ नियम

Rules of Samrat Ashoka Dhamma in Hindi

अशोक के धम्म के नियम
कोई भी किसी भी जीव की हत्या नहीं करेगा।
पेड़ पौधे लगाना, कुओं व विश्राम ग्रहों का निर्माण करवाना।
शाही रसोई घर में जीव हत्या पर अंकुश।
इंसानों व पशुओं के लिए औषधि की  सुविधा।
माता-पिता के आदेशों की पालना।
गरीब व वृद्ध लोगों के लिए अलग से सहायता।
सभी के साथ भलाई का कार्य करना।

सम्राट अशोक का महान व्यक्तित्व

Great personality of Samrat Ashoka in Hindi

भारतीय इतिहास के महान योद्धा सम्राट अशोक ने अपने-आप को कुशल प्रशासक सिध्द करते हुए बेहद कम समय में ही अपने राज्य में शांति स्थापित की। उनके शासनकाल में देश ने विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ चिकित्सा शास्त्र में काफी तरक्की की। उसने धर्म पर इतना जोर दिया कि प्रजा इमानदारी और सच्चाई के रास्ते पर चलने लगी।

चोरी और लूटपाट की घटानाएं बिलकुल ही बंद हो गईं। अशोक घोर मानवतावादी थे। वह रात-दिन जनता की भलाई के लिए काम  किया करते थे। उन्हें विशाल साम्राज्य के किसी भी हिस्से में होने वाली घटना की जानकारी रहती थी।

धर्म के प्रति कितनी आस्था थी, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह बिना एक हजार ब्राम्हणों को भोजन कराए स्वयं कुछ नहीं खाते थे, कलिंग युध्द अशोका के जीवन का आखरी युध्द था, जिससे उनका जीवन ही बदल गया था।

सम्राट अशोक से जुड़े रोचक तथ्य

Interesting facts about Samrat Ashok in Hindi

तो चलिये अब सम्राट अशोक से जुड़े रोचक तथ्यो को जानते है –

सम्राट अशोक से जुड़े रोचक तथ्य :
अशोका के नाम “अशोक” का अर्थ “दर्दरहित और चिंतामुक्त” होता है। अपने आदेशपत्र में उन्हें प्रियदर्शी एवं देवानाम्प्रिय कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोका का नाम अशोक के पेड़ से ही लिया गया था।
आउटलाइन ऑफ़ हिस्ट्री इस किताब में अशोका में बारे में यह लिखा है की, “इतिहास में अशोका को हजारो नामो से जानते है, जहां जगह-जगह पर उनकी वीरता के किस्से उल्लेखित है, उनकी गाथा पूरे इतिहास में प्रचलित है, वे एक सर्वप्रिय, न्यायप्रिय, दयालु और शक्तिशाली सम्राट थे।
लोकहित के नजरिये से यदि देखा जाये तो सम्राट अशोक ने अपने समय में न केवल मानवों की चिंता की बल्कि उन्होंने जीवमात्र के लिए भी कई सराहनीय काम किए हैं। इसलिए सम्राट अशोक को अहिंसा, शांति, लोक कल्याणकारी नीतियों के लिए एक अतुलनीय और महान अशोक के रुप में जाना जाता था।
सम्राट अशोक को एक निडर एवं साहसी राजा और योद्धा माना जाता था।
अपने शासनकाल के समय में सम्राट अशोक अपने साम्राज्य को भारत के सभी उपमहाद्वीपो तक पहुचाने के लिये लगातार 8 वर्षो तक युद्ध लड़ते रहे। इसके चलते सम्राट अशोक ने कृष्ण गोदावरी के घाटी, दक्षिण में मैसूर में भी अपना कब्ज़ा कर लिया, लेकिन वे तमिलनाडू, केरल और श्रीलंका पर शासन नहीं कर सके।
सम्राट अशोक की कई पत्नियां थी, लेकिन सिर्फ महारानी देवी को ही उनकी रानी माना गया था।
कभी हार नहीं मानने वाले सम्राट अशोक एक महान शासक होने के साथ-साथ एक अच्छे दार्शनिक भी थे।
भारतीय इतिहास के अद्धितीय शासक अशोक ने लोगों को शिक्षा के महत्व को समझाया एवं इसका जमकर प्रचार-प्रसार भी किया, आपको बता दें कि उन्होंने अपने जीवनकाल में 20 से ज्यादा विश्वविद्यालयों की स्थापना की थी।
मौर्य वंश में 40 साल के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले सम्राट अशोक ही एक मात्र शासक थे।
सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के एक ऐसे य़ोद्धा थे, जो अपने जीवनकाल में कभी हार का सामना नहीं किया।
महान शासक सम्राट अशोक का अशोक चिन्ह आज के गौरवमयी भारत को दर्शाता है।
सम्राट अशोक के द्धारा बौद्ध धर्म का पूरे विश्व में प्रचार-प्रसार करने एवं भगवान बुद्ध के उपदेशों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में भी जाना जाता है।
सम्राट अशोक ने अपने सिद्धांतों को धम्म नाम दिया था।
सम्राट अशोक जैसा महान शासक शायद ही इतिहास में कोई दूसरा हो। वे एक आकाश में चमकने वाले तारे की तरह है जो हमेशा चमकता ही रहता है, भारतीय इतिहास का यही चमकता तारा सम्राट अशोका है।
एक विजेता, दार्शनिक एवं प्रजापालक शासक के रूप में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा। उन्होंने जो त्याग एवं कार्य किए वैसा इतिहास में दूसरा कोई नहीं कर सका। सम्राट अशोका एक आदर्श सम्राट थे।

सम्राट अशोक की मृत्यु

Samrat Ashok Death in Hindii

सम्राट अशोक की मृत्यु 232 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुई थी। मृत्यु के समय उसकी उम्र 71-72 वर्ष थी। अशोक ने लगभग 37 वर्षों तक प्राचीन भारत पर राज किया।

अपने अंतिम दिनों में उन्होंने राज्य की कमाई को सन्यासियों में बांटना शुरू कर दिया। परंतु, मंत्रियों ने ऐसा करने से रोक दिया। तो अशोक ने खुद की चीजों को दान देना शुरू कर दिया।

जब अपना सब कुछ दान दे दिया तो एक विशिष्ट फल जो अशोक के पास रहता था उसे भी दान के रूप में दे दिया। वह पूरी तरह से बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो चुका था। जब अशोक का देहांत हो गया था तो अशोक के शरीर को 7 दिन और रातों तक जलाया गया।

सम्राट अशोक से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर (FAQ)

Some Important Questions and Answers related to Samrat Ashoka in Hindi

प्रश्न :- सम्राट अशोक कौन थे ? 

उत्तर :- अशोक भारत के मौर्य साम्राज्य का सबसे प्रमुख राजा था। अपने शासनकाल के दौरान वह बौद्ध धर्म के समर्थक थे, जिसने भारत में बौद्ध धर्म को प्रसार करने में मदद की।

प्रश्न :- सम्राट अशोक का धर्म क्या था?

उत्तर :- बौद्ध धर्म

प्रश्न :- अशोक को महान क्यों कहा जाता है?

उत्तर :-  चक्रवर्ती सम्राट अशोक शुरू से ही प्रजा कल्याण को प्राथमिकता देता था। साथ ही कलिंग युद्ध के पश्चात प्रजा को पुत्रों के समान मानकर प्रेम करता था। अशोक की शासन व्यवस्था, कला प्रेम के साथ-साथ उसकी युद्ध कौशलता, उसके आदर्श और धम्म की विशेषताओं के कारण सम्राट अशोक को महान कहा जाता है।

प्रश्न :- सम्राट अशोक ने अपने जीवन मे कितने युद्ध लडे ?

उत्तर :- सम्राट अशोक ने अपने जीवन में मात्र 1 ” कलिंग का युद्द ” लड़ा था और उसके बाद जीवन में वापस कभी युद्द ना लड़ने की कसम खायी थी जो उन्होंने मरते दम तक निभाई।

प्रश्न :- सम्राट अशोक का राज्य कहाँ तक फैला था ?

उत्तर :- सम्राट अशोक का राज्य वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और इराक में फैल गया। उस समय भारत काफी फैला हुआ था। आज का पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, नेपाल और भूटान उस समय भारत का हिस्सा थे।

प्रश्न :- सम्राट अशोक ने अपनी अंतिम सांस कहाँ ली ?

उत्तर :- पाटलिपुत्र, अब पटना में 72 वर्ष की आयु में एक सम्राट की तरह मृत्यु हो गई

प्रश्न :- अशोक के शिलालेखों की संख्या कितनी थी?

उत्तर :- 40

प्रश्न :- अशोक का सबसे बड़ा शिलालेख कौन सा है?

उत्तर :- अशोक का 13वें शिलालेख सबसे लंबा शिलालेख है

प्रश्न :- अशोक का सबसे छोटा अभिलेख कौन सा है?

उत्तर :- रुम्मीदेई अभिलेख अशोका का सबसे छोटा अभिलेख है।

प्रश्न :- अशोक के धम्म से आप क्या समझते हैं?

उत्तर – अशोक के धम्म अथवा धर्म से आशय कल्याणकारी कार्य करना, पाप नहीं करना, मीठी वाणी, दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार, दान, दया आदि हैं। यह परिवर्तन कलिंग युद्ध में विजय के बाद चक्रवर्ती सम्राट अशोक के मन में आया था और इसी वजह से अशोक के धम्म की स्थापना की गई।

प्रश्न :- युद्ध न करने का संकल्प अशोक ने क्यों किया?

उत्तर – कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार के बाद उनका हृदय परिवर्तित हो गया और उन्होंने कभी भी युद्ध न करने का संकल्प लिया, साथ ही उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया।

प्रश्न :- कलिंग की राजकुमारी का क्या नाम था?

उत्तर – कलिंग की राजकुमारी का नाम मत्स्यकुमारी कौर्वकी था।

प्रश्न :- कलिंग राजा कौन था?

उत्तर :-  कलिंग के राजा का नाम अनंत नाथन था।

प्रश्न :-  उड़ीसा का पूर्व नाम क्या है?

उत्तर :- उड़ीसा का पूर्व नाम कलिंग था?

प्रश्न :- कलिंग का नया नाम क्या है?

उत्तर :- कलिंग का नया नाम उड़ीसा है।

प्रश्न :- सम्राट अशोक जयंती कब है?

उत्तर :- 14 अप्रैल

प्रश्न :- सम्राट अशोक की जयंती कब मनाई जाती है?

उत्तर :- सम्राट अशोक की जयंती चैत्र मास के द्वितीय पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व चैत्र मास की द्वितीय पक्ष की अष्टमी को सम्राट अशोक का जन्म हुआ था और यही कारण है कि इस दिन “सम्राट अशोक की जयंती” ना सिर्फ भारत में बल्कि आसपास के देशों में भी मौर्य “सम्राट अशोक की जयंती” या जन्मोत्सव मनाया जाता है,

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